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September 29 परीक्षण
छुटपन में सुना था, बुजुर्गों की महफ़िल में खैनी चूना आँख में डालने से आँखें अन्धी हो जाती हैं
चंचल मन प्रयोग कर वास्तविकता को निहारना चाहता था
इन्सान की आँखें दर्द महसूस करती हैं, सो एक कुत्ते की आँख में, मैनें मिश्रण झोंक दिया
उसकी तड़प और दर्द की अभिव्यक्तियॉ, मेरे अन्तर्मन को आत्मग्लानि से भर दिया था
उसके नेत्र से बह रहे मवाद उसके आँसुओं को समेटे थे, कहीं न कहीं
इतने बरस बाद, पुनः वे आँसू मेरे नेत्रों से फिसल पड़ते हैं
परीक्षण आज भी होते हैं प्रयोगशालाओं में, अफसोस इन्सानी आँसू अब बाहर नहीं आते………
February 05 वह कहता है
तुम उसे ढूँढ न पाओगे उस रहस्य को जिसकी छाया तले तुम तिलमिला रहे हो बने एक लाचार वह कहता है
तुम देख नहीं सकते तुम सुन नहीं सकते तुम महसूस नहीं कर सकते हर स्थिति से, तुम अपंग कर दिये गये हो वह कहता है
तुम धोखे में हो अपने आप में कैद एक कैदी हो खूबसूरत कैदखानों में रखा है तुमको हाँ तुम कैद हो, चीखकर वह कहता है
एकाएक चुप होकर वह निहारता है इस संसार के रंग भरे दृश्यों को पल भर की मुस्कान बिखेर फफक कर रो पड़ता है मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ मुझे आज़ाद कर दो, आज़ाद …… करूण स्वर में वह कहता है February 04 हिन्दी लेखन और Screamer रेडियो का लुत्फ़ अब UBUNTU (Linux) पर भी …………
पिछले लेख में बड़े भैया ने नोकिया फोन (जीपीआरएस) से इंटरनेट कनेक्ट करने की बात पूछी थी। जिस पर अभी कार्य चल रहा है सफलता मिलते ही सूचना मिल जयेगी। और उन्मुक्त भाई से बस इतना कहना चाहूँगा कि UBUNTU (Linux) इंस्टाल करना बेहद सरल है, जैसे एक साफ्टवेयर इन्स्टाल किया जाता है वैसे ही इसे भी किया जा सकता है। चुनना आपको है कि आप विंडोज के साथ UBUNTU (Linux) रखना चाहते हैं कि मुक्त रूप से केवल UBUNTU (Linux) ही इंस्टाल करना चाहते हैं। पिछले लेख में मुफ्त सीडी कैसे प्राप्त किया जाय यह बताया जा चुका है। 1) UBUNTU (Linux) पर हिन्दी कैसे लिखें ? अगर आप UBUNTU (Linux) 8.04 के प्रयोगकर्ता है तो आप एक छोटी सी इन्स्टालर फाइल language-pack-gnome-hi_8.04+20080415_all यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं। UBUNTU (Linux) 8.10 के यूजर को इस फाइल की कोई आवश्यकता नही है। इस फाइल को इंस्टाल कर लेने के पश्चात आप System > Administration > Language Support तक आ जाये। तदोपरान्त लिस्ट से हिन्दी भाषा चुनकर ओ के बटन दबा दें। कुछ Supported फाइले डाउनलोड होंगी और इन्स्टालेशन पूर्ण हो जायेगा। (इस दौरान आप इंटरनेट से जुड़े रहे)। सिस्टम पुनःआरम्भ करने के पश्चात आप उपरी कोने पर कीबोर्ड का एक आइकान देखेंगे जिसकी मदद से आप हिन्दी के साथ अन्य भारतीय भाषा भी लिख सकते हैं। यह विंडोज में उपयोग किये जाने वाले हिन्दी यूनिकोड राइटर जैसा ही कार्य करता है। अतः हिन्दी लिखने में कोई समस्या नही आती। 2) Screamer रेडियो का आनन्द नेट सर्फिन्ग के दौरान …………>> अगर आप पुराने और नये, भक्तिमय और धूमधड़ाके जैसे गाने सुनने के शौकीन हैं तो आपके लिये यह बिल्कुल ही उपयुक्त है……… नेट सर्फिंग के साथ साथ मनोरंजन भी हो जाय तो आनन्द दोगुना हो जाता है और अपना कार्य भी कुशलता से निपट जाता है। Screamer Radio अब तक केवल विंडोज पर ही शोभायमान रहा है तथा UBUNTU (Linux) पर ऐसी खुशबू खोजे नही मिलती। लेकिन एक तरीका है जिससे आप इस खुशबू को लगातार महसूस कर सकते है। तरीका : सर्वप्रथम आप Wine का उपयोग करें। अरे भाई!! पीने के लिये नही बल्कि इंस्टाल करने के लिये … अगर पहले से ही इंस्टाल कर रखा है तो कोई बात नही। Method for installing Wine …. (इंटरनेट से आप जुड़े रहे) Application > Accessories > Terminal And Write Sudo apt-get update Sudo apt-get install wine कुछ देर बाद Wine इंस्टाल हो जायेगा। इसके बाद Screamer Radio यहाँ से डाउनलोड कर लीजिये और Home Directory में सुरक्षित कर लीजिये। फाइल को Extract कर लीजिये और Screamer Radio > screamer.exe पर दो बार चटका (क्लिक) लगाइये। लीजिये ज़नाब हो गया। Play पर click करते ही गानों की एक सुरीली धुन आपके कानों को सुकून पहुँचायेगी। ध्यान रखे :- यह जुगाड़ Method है अतः Menu Bar को हाथ न लगाये। मीनू बार को क्लिक करते ही आप का सारा सिस्टम फ्रीज़ हो जायेगा। जिसके लिये आपको System Restart or Log Off की ज़रूरत पड़ सकती है। अतः आपसे निवेदन है कि जुगाड़ के साथ NO छेड़खानी……… मैनें प्रीसेट के तौर पर एक लोकप्रिय रेडियो स्टेशन पहले से ही ट्यून कर रखा है अतः सिर्फ़ Play करने की ज़रूरत होती है। 3) Screamer Radio को Sound and Videos लिस्ट में रखना …………>> बार बार Home Directory में जाकर screamer.exe पर क्लिक करने की झंझट से भी बचा जा सकता है, वो ऐसे …… Right click on Application Edit menu > Sound and Videos Add Items Name – Screamer Radio Browse > Home Directory >Screamer Radio >screamer.exe For screamer Icon ……. Drag and drop this image at Icon place And close …….. you can now start screamer radio from Application > Sound and Videos > Screamer Radio इति श्री राजर्षि नारद से अपेक्षा है कि वे समझ गये होंगे। कोई और समस्या हो तो समाधान के लिये ज़रूर याद करें। - मनीष January 28 Surf the internet on Reliance ZTE MC315 data card and Huawei E325 USB card on UBUNTU (Linux)
आज तकनीकविद् बनने का विचार मन में समाया है। सोचा जो कुछ थोड़ी बहुत जानकारी मेरे भेजे में एकत्रित है उसे आप पर उड़ेल दूँ। अगर आप वायरस नाम की घिनौनी प्रजाति से खिन्न हैं, सुरक्षा को लेकर अच्छे खासे चिन्तित हैं और एंटीवायरस अपडेट के झमेले में पड़े रहते हैं तो आपके लिये यह सुखद लेख साबित हो सकता है। यहाँ पर वैज्ञानिक भाषा का ज्यादा प्रयोग करना मुझे उचित नही लगता और न ही ज्यादा ताम झाम के साथ आपको समझाना चाहता हूँ। या यूँ कहें समझा ही नही सकता हूँ J तो मेरी सरल सुबोध भाषा प्रस्तुत है…… फोकट में उपलब्ध आपरेटिंग सिस्टम है UBUNTU जो कि घर बैठे बिठाये मिल जाता है बस http://www.ubuntu.com/ का दौरा कीजिये और जहाँ पर मुफ़्त सीडी भेजने की बात हो वहाँ लपक कर क्लिक कर दीजिये। रजिस्ट्रेशन करने के बाद अपना नाम पता लिख छोड़िये। महीने भर के अन्दर सीडी हाथ में …… अगर इन्तजार करने का मन नही है तो Image file ही डाउनलोड कर लीजिये और Magic ISO Software से उसे Extract कर लीजिये, एक कोरी सीडी का ख्रर्च बच जायेगा। अलग से Hard Disk का partition बनाने की भी कोई जरूरत नही। C ड्राइव मे अगर 4-6 गीगा बाइट मुक्त जगह हो तो काम बन जाता है। इन्स्टालेशन के बाद आप दोहरे आपरेटिंग सिस्टम के मालिक हो जाते हैं चाहे XP/VISTA में उछलिये कूदिये चाहे UBUNTU में …… अगर आपके पास LAN Dial up /LAN ब्राडबैण्ड कनेक्शन हो तो कोई गम नही। जी खोल कर दौड़िये पूरे संसार पर …… परन्तु अगर आप चलायमान हैं माने कि लैपटाप होल्डर हैं और डाटा कार्ड या USB कार्ड से नेट कनेक्ट करते हैं तो थोड़ा सा व्यवधान आता है। जिससे मैं भी परेशान था। आइये परेशानी हल करते हैं। पहली परेशानी à Reliance ZTE MC315 CDMA 1X PCMCIA data card पहले तो एक “setserial_2.17-45_i386.deb” नामक installer फ़ाइल को यहाँ से डाउनलोड कर लीजिये और Home Directory में Save कर लीजिये। अब Application > Accessories >Terminal को शुरु कीजिये। और लिखना प्रारम्भ कीजिये … थोड़ा सा कष्ट उठा ही लीजिये sudo dpkg –i setserial* press Enter key …………… हो गया। अब अपने PCMCIA कार्ड को insert कीजिये तथा Application > Accessories >Terminal मे जाकर लिखिये sudo dmesg ऐसा कुछ लिखा दिखाई देगा। pccard: PCMCIA card inserted into slot 0 [ 17.688000] cs: memory probe 0xb0100000-0xb01fffff: excluding 0xb0100000-0xb010ffff [ 17.692000] pcmcia: registering new device pcmcia0.0 [ 17.712000] tifm_core: MMC/SD card detected in socket 0:3 [ 17.744000] cs: IO port probe 0x100-0x3af: clean. [ 17.748000] cs: IO port probe 0x3e0-0x4ff: excluding 0x4d0-0x4d7 [ 17.748000] cs: IO port probe 0x820-0x8ff: clean. [ 17.748000] cs: IO port probe 0xc00-0xcf7: clean. [ 17.748000] cs: IO port probe 0xa00-0xaff: clean. [ 17.876000] ttyS3: detected caps 00000700 should be 00000100 [ 17.876000] 0.0: ttyS3 at I/O 0x2e8 (irq = 3) is a 16C950/954 तथा अन्तिम पंक्ति मे ये दिखेगा। 17.876000] 0.0: ttyS3 at I/O 0x2e8 (irq = 3) is a 16C950/954 विशेषकर आप ttyS3 पर ध्यान दें यह ttyS0, ttyS1 या ttyS2 भी हो सकता है। आप कार्ड की जानकारी भी ज्ञात कर सकते हैं कि वह काम कर रहा है या नहीं। Application > Accessories >Terminal And write sudo pccardctl info संदेश दिख जायेगा। अब wvdial.conf के साथ खुरपेंच करने की बारी आती है Application > Accessories >Terminal & write sudo gedit /etc/wvdial.conf परिवर्तन हेतु वह फाइल खुल जायेगी और आप परिवर्तन कर सकते हैं wvdial.conf नामक फाइल में लिखी सभी पंक्तियों को मिटा कर इसे लिखिये ------------------------------------------------------------- #[Dialer Default] Modem = /dev/ttyS3 (इस स्थान पर ttyS0, ttyS1 या ttyS2 जैसा कि आप के डाटा कार्ड द्वारा प्रदर्शित हुआ है, लिखें) Baud = 230400 SetVolume = 0 Dial-AT-OK ATDT Command = Init1 = ATZ FlowControl = Hardware (CRTSCTS) Phone = #777 Username = (my mobile no) Password = (my password) New PPPD = yes Carrier Check = no Stupid Mode = yes ------------------------------------------------------------------------------------------- और इस फाइल को Save कर लीजिये। अब खेलने का समय आने ही वाला है बस Application > Accessories >Terminal मे जाकर लिखिये sudo setserial /dev/ttyS3 uart 16954 *(write ttyS0,ttyS1,ttyS2 as shown by your system) sudo setserial /dev/ttyS3 baud_base 230400 **(you can use 230400 or 460800 as accepted by your pc card) sudo wvdial इसके बाद आप मजे करिये अगर ये पंक्ति दिख गयी तो … Initializing modem. WvDial<*1>: Sending: ATZ WvDial Modem<*1>: ATZ WvDial Modem<*1>: OK WvDial<*1>: Modem initialized. WvDial<*1>: Sending: ATDT#777 WvDial<*1>: Waiting for carrier. WvDial Modem<*1>: ATDT#777 WvDial Modem<*1>: CONNECT WvDial<*1>: Carrier detected. Starting PPP immediately. WvDial<Notice>: Starting pppd at Thu Jan 10 01:45:21 2008 WvDial<Notice>: Pid of pppd: 7883 WvDial<*1>: Using interface ppp0 WvDial<*1>: pppd: ?[06][08]??[06][08] WvDial<*1>: pppd: ?[06][08]??[06][08] WvDial<*1>: pppd: ?[06][08]??[06][08] WvDial<*1>: pppd: ?[06][08]??[06][08] WvDial<*1>: local IP address 220.226.x.1xx WvDial<*1>: pppd: ?[06][08]??[06][08] WvDial<*1>: remote IP address 220.224.1xx.x WvDial<*1>: pppd: ?[06][08]??[06][08] WvDial<*1>: primary DNS address 202.138.Xxx.xxx WvDial<*1>: pppd: ?[06][08]??[06][08] WvDial<*1>: secondary DNS address 202.138.Xx.x WvDial<*1>: pppd: ?[06][08]??[06][08] बस काम हो गया। अब अपना ब्राउज़र (firefox) खोल कर विचरण करिये इस मायावी दुनिया में… ध्यान रहे कि कहीं आपका ब्राउज़र (अग्निलूमड़) आफलाइन मोड मे तो नही है न!! अगर है तो File> Offline पर एक छोटा सा चटका लगाइये और शुरु हो जाइये… कोई समस्या हो तो बताइये। और हाँ Disconnect करने के लिये Ctrl+C दबाये। और अगली बार फ़िर से नेट कनेक्ट करने के लिये इसे दोहराये sudo setserial /dev/ttyS3 uart 16954 *(write ttyS0,ttyS1,ttyS2 as shown by your system) sudo setserial /dev/ttyS3 baud_base 230400 **(you can use 230400 or 460800 as accepted by your pc card) sudo wvdial पहला भाग समाप्त हुआ। दूसरी परेशानी à Reliance Huawei E325 USB card अगर इस प्रकार का जुगाड़ आपके पास है तो ज्यादा परेशान होने की ज़रूरत नही… बस छोटा सा काम कर डालिये कार्ड को insert कीजिये तथा Application > Accessories >Terminal मे जाकर लिखिये sudo dmesg अगर आपको अन्तिम पंक्ति मे ttyUSB0 (ttyUSB1,ttyUSB2,ttyUSB3 भी हो सकता है) शब्द दिख जाय तो इस शब्द को गाँठ बाँध कर रख लीजिये और अब wvdial.conf के साथ खुरपेंच करने की बारी आती है Application > Accessories >Terminal & write sudo gedit /etc/wvdial.conf परिवर्तन हेतु वह फाइल खुल जायेगी और आप परिवर्तन कर सकते हैं wvdial.conf नामक फाइल में लिखी सभी पंक्तियों को मिटा कर इसे लिखिये ----------------------------------------------------------------------- [Modem0] Modem=/dev/ttyUSB0 (ttyUSB1,ttyUSB2,ttyUSB3 as shown by your system) Baud=115200 SetVolume=0 Dial Command = ATDT init1=ATZ init2=AT+CRM=1 FlowControl= Hardware (CRTSCTS) [Dialer bsnl] Username= 165 Password= 165 Phone=#777 Stupid Mode= 1 Inherits = Modem0 --------------------------------------------------- और इस फाइल को Save कर लीजिये। Application > Accessories >Terminal मे जाकर लिखिये sudo setserial /dev/ttyUSB0 uart 16954 *(write ttyUSB3,ttyUSB1,ttyUSB2 as shown by your system) sudo setserial /dev/ttyS3 baud_base 230400 **(you can use 230400 or 460800 as accepted by your pc card) sudo wvdial काम समाप्त हुआ आप जुड गये संसार से … अगर ये दिखा तो -> Initializing modem. --> Sending: ATZ ATZ OK --> Sending: ATQ0 V1 E1 S0=0 &C1 &D2 +FCLASS=0 ATQ0 V1 E1 S0=0 &C1 &D2 +FCLASS=0 OK --> Modem initialized. --> Sending: ATDT#777 --> Waiting for carrier. ATDT#777 CONNECT 230400 --> Carrier detected. Starting PPP immediately. --> Starting pppd at Thu Nov 13 15:02:23 2008 --> Pid of pppd: 9371 --> Using interface ppp0 --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] --> local IP address 121.245.91.239 --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] --> remote IP address 172.23.137.14 --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] --> primary DNS address 202.54.15.30 --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] --> secondary DNS address 202.54.1.30 --> pppd: ??[06][08]8?[06][08] Disconnect करने के लिये Ctrl+C दबाये। और अगली बार फ़िर से नेट कनेक्ट करने के लिये बस इतना ही करना है। Application > Accessories >Terminal And write sudo wvdial बस और कुछ नहीं दूसरा भाग भी समाप्त हुआ। एक अन्तिम बात – अगर आपके पास इंटरनेट की सुविधा है तो बाकी अन्य परेशानियों से निबट सकते हैं लेकिन इंटरनेट ही न हो तो काम न बनेगा…………तो मैने काम बना दिया है और अब आप जी भर कर उपयोग कीजिये। कोई परेशानी हो तो ज़रूर सूचित कीजिये। धन्यवाद !! January 19 ए टी एम बोले तो आफ़त ट्रान्सफरिंग मशीन
अधुनिकता ने बड़ी जल्दी ही जन समुदाय को अपने चपेट में ले लिया है। लेकिन इस जन समुदाय की लीला बड़ी विचित्र है। उस दिन स्टेट बैंक वालों ने बाकायदा फूल माला सजाकर, स्टाफ़ को मिठाई खिलाकर, पब्लिक को ललचाकर एक छोटे से कमरे में एक डिब्बा रख गये जो अद्भुत तरीके से नये नये नोट उगलती थी। वे लोग खुश हो गये जिनके पास नोट उगलवाने का मन्त्र था या फ़िर वे जो बैंकों से विशेष प्रकार की मन्त्र दीक्षा ले रखी थी जिससे नोट उगलवाना आसान होता है। इन सबके बीच कुछ ऐसे लोग थे जो मात्र इतना जानते थे कि उनके इलाके में अब अइटीअम लग गया है। वह क्षेत्र मूल रूप से गरीबों का इलाका था। जहाँ एक सुविख्यात मन्दिर है जिसके कारण संभ्रान्त परिवार के लोग भी उस क्षेत्र का अक्सर दौरा करते थे। साथ ही बैंकों की यह पालिसी रही है कि वह अपने कष्ट-मर को हर सम्भव सहायता (विपत्ति) पहुंचाये। सो बैंकों ने कष्टमरों का साथ वहाँ तक भी नहीं छोड़ा कि वे शान्ति के साथ हरि भजन कर सकें। अमूमन अगर भिखारियों को पैसे बाँटते वक्त पैसे खतम हो जाये तो ये आपके लिये …… विशेष सुविधा, बच्चे रो धो कर खिलौने, गुब्बारे माँगने लगे तो आपके मुँह से ये न निकलने पाये कि बेटा पैसे नही हैं … उस पल के लिये …… विशेष सुविधा, बीवी मुँह फुला कर बैठी है कि उसे चुनरी, सिन्दूर, चिमटा, बेलन वगैरह वगैरह चाहिये तो आपके पास कोई बहाना न हो, उस खीझ के लिये …… विशेष सुविधा। इन बैंक वालों का क्या है, पैसे तो हमें भरने पड़ते हैं और ये हैं कि जब देखो तब पैसा लुटवाने को आतुर रहते हैं। पहले आदमी के पास कुछ रुपये होते थे तो वह बैंक में डाल देता था कि बचे रहेंगे लेकिन आज स्थिति उलट है, पचास रुपये की जरूरत हुई तो आदमी पाँच सौ की एक पीली पत्ती निकाल लाता है और शाम होते होते पचास रुपये ही बचते हैं। बुजुर्गों ने भी कहा है कि पैसे हाथ में लेकर नहीं चलते ……… बल्कि लंगोट में खोंस कर चलना चाहिये ताकि निकालने में झिझक हो … ए टी एम लग गया था जैसा कि बैंकों की पालिसी रही है कि आपको तनिक मात्र भी दुख-कष्ट न पहुँचे, उस पालिसी के अनुसार ए सी बोले तो वातानुकूलित कमरे का इन्तजाम हुआ था। ताकि अगर एक आध सौ की नोट कम निकले तो भी आप चिर शान्ति की अनुभूति करें और खुशी खुशी घर चले जाय। घर जाकर बीवी को हिसाब देते समय गड़बड़ी सामने आ जाय तो बीवी द्वारा दिये गये लात घूँसों का जिम्मेवार बैंक नही है। वातानुकूलित कमरे से अनभिज्ञ गरीब बच्चे अक्सर अन्दर बाहर होते और आश्चर्य प्रकट करते कि अन्दर जाड़ा है बाहर गर्मी है …… कुछ दार्शनिक टाइप के बोलते – बरसात भी है क्योंकि वातानुकूलक यन्त्र से पानी टपक कर फर्श पर फैलता रहता। जिससे पता चलता है कि सरकारी चीज ही घटिया होती है। मशीन लग गयी थी। मन्त्रधारी लोग अपना अपना मन्त्र हाथ में लिये पहुँचने लगे, कुछ दिनों में वहाँ इतनी भीड़ होने लगी कि वातानुकूलित कमरा भी आग उगलने लगा। सभी अपना अपना खुरपेंच लिये मशीन में डालते और निकालते रहते, दूसरे हाथ से पसीना पोछ कर कहते बड़ी गर्मी है भाई……… और दस – बीस गाली बैंक को जड़ देते। इस बात से बेखबर कि गाली उन्हीं को मिलनी चाहिये। हमारे इलाहाबाद के अल्लापुर की यह परम्परा रही है कि पैसे निकालते वक्त एक आदमी एक समय पर ए टी एम रूम में नही घुसता बल्कि सभी कुकुरमुत्ते की भाँति मशीन को घेरकर खड़े हो जाते हैं, जब सभी लोग लदे रहेंगे तो कमरा क्योंकर ठंडा हो। जन समुदाय गाली गलौज में ही समझदार है मानो गाली विषय में गोल्डमेडल से नवाजा गया है। स्टेट बैंक के सुशिक्षित गार्ड ने उन सबको बात यह बात समझाई कि श्रीमान एक समय पर एक ही जन अन्दर जायें …… इतनी सी बात बोलते ही उसे लतिया दिया गया। वह भी खीझ कर ए टी एम की रखवाली करना छोड़ दिया। नतीजन नोंटों का जखीरा अकेला पड़ गया और छोटे बच्चे आकर उसमें लकड़ी से खुरपेंच करने लगे इस आशय से कि इसमें कुछ डाला जाता है तभी पैसे आते हैं। कुछ बड़े खुरपेंची शीशा तोड़कर ट्यूबलाइट ही निकाल कर चलते बनें, और एक दिन तो नोटों की देवी, मशीन पर ही हमला हो गया लेकिन भाग्यवश वह बच गयी लेकिन पूरी साज सज्जा तहस नहस हो गयी। तब से आज तक उसी स्वरूप में वह कमरा पड़ा है। भीड़ इकट्ठी होती है तो झगड़ा होना तय है क्योंकि लकड़ी से खुरपेंच करने के कारण स्वैपिंग प्रक्रिया ठीक प्रकार से नही हो पाती और पीछे खड़ा व्यक्ति आगे वाले को जल्दी करने को कहता है और बात बढ़ती है और अच्छे से खुरपेंच हो जाती है। बीच बचाव में पीछे से आये कुछ भद्रेश उन सबको समझा कर कहते हैं - देखो ! ऐसे डालते हैं फ़िर धीरे धीरे हौले से खींचते हैं फ़िर ये आता है फ़िर ये …… पैसे निकालते हैं और निकल लेते हैं। भाड़ में जाये दुनिया अपना तो काम हो गया…… महौल शान्त होता है तो फ़िर से खुरपेंच होती है, स्वैपिंग कायदे से हो गयी तो टच स्क्रीन को ऐसे दबाया जाता है मानो कोई बटन …… कोई अंगूठे से दाबता है तो कोई पूरा हाथ ही लगा देता है…… टेक्नोलॉजी की देवी अगर उस धरती पर अवतरित हो जाये तो उनका भी तियाँ पाँचा एक कर दिया जायेगा। धीरे धीरे एक एक लोग निकलते जाते हैं कि तभी ज़लालत झेल रहे मशीन से आवाज आती है Sorry, temporarily Unable to process. Please visit another SBI ATM. लोगों का चेहरा अचानक ही लटक जाता है और अब तक धक्कापेल कर रहे लोग आपस में पूछते हैं भाई साहब आसपास कोई दूसरा है। कुछ निर्दयी प्रजाति के प्राणी मशीन पर लात मारकर गाली बकने लगते हैं। धन्य है कि मशीन है कोई बाबूजी (कलर्क) होते तो उनका क्रिया करम हो जाना निश्चित है, इस बात को शायद वे भी जानते हैं तभी तो बैंक में जालीदार खिड़कियों के भीतर दुबके रहते हैं। ए टी एम कथा निराली है इसका नित पान करने से आफत से छुटकारा मिलता है, कोई तुलसीदास का वंशज या प्रशंसक हो तो वह इस पर ए टी एम चालीसा भी लिख सकता है। --- मनीष November 20 रूके रूके से कदम……… आइये चल फिर लेते हैं… थोड़ा अगाड़ी, थोड़ा पिछाड़ी.चलना सीख जाने के बाद चलना कितना आसान काम लगता है जैसे हमेशा से ही हम इसे जानते रहे हों पहली बार पांव चलने की स्मृति किसी के पास नही होती मां नानी या बहनों से सुने किस्सों से ही हम जान पाते हैं कि कितने दिनों तक हम घुटने ही चलते रहे कि पहली – पहली बार किसकी उंगली पकड़ कर हमने कितने डगमगाते हुए रखा था एक – एक कदम चलने की कोशिश में कितनी बार गिरे और रोये थे दीवार के सहारे खड़ा कर दिया था बगल की मुंहबोली मौसी ने और अचानक ही हम चलने लगे थे खुशी से भर गया था घर और औंधे मुँह गिरने से पहले ही माँ ने लौक लिया था हमें लकड़ी की तीन पहियों वाली वो गाड़ियाँ या प्लास्टिक और स्टील पाइप से बने वाकर देख कर भी कभी याद नही आता कि हमने भी कभी उनका उपयोग किया था पहली बार हमें चलते हुए देख कर कितनी खुश हुई थी माँ और कितनी चिंता से भर गयी थी दिन भर घर में गूँजता रहता था एक ही वाक्य देखना वो सीढ़ी की तरफ न चला जाये…… देखना कहीं बाहर न निकल जाये सड़क पर……… चलने के बारे में कितनी हिदायतें दी जाती थीं हमेशा अब कुछ भी याद नहीं जब कोई बूढ़ी औरत हमारे बचपन का किस्सा छेड़ देती है जब कोई बताता है कि कितनी मुश्किल से हमें सिखाया गया पाँव – पाँव चलना तो कभी विश्वास ही नही होता कि धरती कभी इतनी सख्त रही होगी हमारे पाँवो के नीचे एक बच्चे के पाँव चलने के कितने किस्से होते हैं हर एक घर में कि पहली बार घर से बाहर सड़क पर चलते हुए गोंदी में उठा लिये जाने को कैसे मचलने लगते थे हम कि किस तरह उँगली छोड़कर भागने लगते थे सड़क पर कि एक बार तो साइकिल से टकराते – टकराते बचे थे कि भाग कर अगर न पकड़ लिए जाते तो बस के नीचे ही आ गये होते कि चलते हुए हम चलने में ऐसे मगन हो जाते थे कि अपना संतुलन ही नहीं रख पाते थे हर कहीं टकरा जाते या औंधे मुँह गिर पड़ते कि हमने कई बार अपने घुटने फोड़े थे चलना सीख जाने के बाद चलना कितना आसान काम लगता है कभी याद ही नहीं आता कि किस तरह स्कूल जाते हुए हर दिन देहरी पार करने से पहले माँ कहती थी किनारे – किनारे सड़क के एक तरफ चलना अगल – बगल देखकर पार करना सड़क दुर्घटनाओं की खबरें पढ़ते हुए अक्सर सोचता हूँ कितनी कठिन जगह बनती जा रही है धरती दिनों दिन एक पैदल चलते आदमी के लिए पहली बार घर से बाहर जाते समय मुझे हिदायतें देते हुए जितनी डरी होगी माँ उससे कहीं ज्यादा आशंकाओं से भरे हुए हैं हम अपने बच्चों को सड़क पर चलने का कायदा समझाते हुए
धरती पर पैदल चलता आदमी अब एक सम्मानजनक दृश्य नहीं रहा। October 24 गये थे सज धज कर, लौटे फटी जांघिया में
अभी कुछ दिन पहले हमारे एक मित्र अपनी अनदेखी प्रेमिका की शादी में शामिल होने गये थे। आजकल क्या है कि संचार माध्यम के द्वारा भी प्रेम फल फूल रहा है, इसी में हमारे मित्र भी अटक गये। अटकना स्वाभाविक ही है उमर भी तो वही है। 16 बरस की बाली उमर… पिछले एक वर्ष से ये ज़नाब हर रोज शाम को 100 रुपये का टाक वैल्यू अपने फोन में डालते और रात भर न जाने क्या क्या बतियाते और सुबह से दोपहर तक बाकायदा चद्दर तान कर सोते। रोज की यही स्थिति थी, कालेज का एक दो क्लास ज़रूर मिस हो जाता लेकिन वहाँ भी प्राक्सी सुविधा के चलते इन्हें सुकून था। दशहरा की छुट्टियाँ थीं। ये भाई फोन से चिपके हुए थे कि अनदेखी प्रेमिका ने अपनी बहन की शादी में आने का न्योता इन्हें दे डाला। दीदार की चाहत में इन्हें और कुछ नहीं सूझा फटाफट तैयारी कर ली। इन्हें यूँ तैयार होते देख इनके पड़ोस के मित्र भी ललचायी आँखों से देखे और बोले – अंकित! टूर पर जा रहे हो? अंकित – मत पूछिये, एडवेंचरस घूमाई घूमने जा रहे हैं। आप भी चलेंगे? उनके मित्र - हाँ यार क्यों नही! कब तक लौटना होगा? अंकित – कल सुबह तक… फिर वे भी जोशिया गये। फटाफट दौड़ते हुए अन्दर गये और परफ्यूम छिड़कने लगे। कुछ ही देर बाद दोनों शूर वीर शर्ट खोंस कर, पैरों में नये जूते बाँधे और कंधे पर कोट लटकाये अपने गंतव्य की तरफ रवाना हुए। जो कि 60 किमी दूर था, जाते जाते शाम हो गयी थी। अब ये उनकी नियति थी या सौभाग्य था की जिस गाँव की बात उनकी प्रेमिका ने किया था उस नाम के तीन गाँव 15 किमी के दायरे में स्थित थे। जो कि चित्रकूट क्षेत्र से लगा था। पहले पहल तो ये बिना जाने समझे एक व्यक्ति से उस नाम के गाँव की लोकेशन पता कर ली और पैदल ही निकल लिये जो कि मुख्य सड़क से 7 किमी दूर था। पैदल चलते चलते रात के 8 बज गये कि तभी गाँव से दूर एक जोरदार रोशनी इन्हें नज़र आयी। इन्हें लगा कि शादी वाला तम्बू वही है। रास्ते में मिले एक व्यक्ति से उन्होंने पूछा – भाई साहब वो जो दूर तम्बू लगा है वो किसका है और उनका घर कहाँ है? लेकिन राहगीर को कुछ समझ में नही आया कि ये क्या कह रहे हैं।.......................... यह सोचकर कि इस समय बाराती रसगुल्ले, गुलाबजामुन गपक रहे होंगे, ये दोनों द्रुत गति से उस तरफ दौड़ पड़े। करीब जाकर देखा तो रामलीला हो रही थी। राम – रावण युद्ध चल रहा था और रावण जोरदार हँसी हँस रहा था, मानो इन्ही बेवकूफों पर हँस रहा हो। इन्हें सूटबूट में लिपटा देख रामलीला कमेटी वाले इनकी तरफ दौड़ पड़े कि शायद कोई गणमान्य अतिथि आये हों। रावण और राम भी युद्ध करना छोड़कर इन दो नमूनों को देखने लगे कि देखें तो कौन सूटबूटधारी आया है जो हमारी कला से खुश होकर 500-500 का नोट देगा। इन दोनों सज्जनों को अपनी ओर देखते हुए रावण खुश होकर जोर जोर से हँसने लगा मानो ये राम को चिढ़ा रहा है कि वो 500 मुझे मिलने वाले हैं। मुफ्त में मिली इज्जत बचाने हेतु 200 रुपये इनकी जेब से निकले और राम रावण पर न्यौछावर हो गये। कुछ देर तक वे दोनों रामलीला में लगी ए-क्लास कुर्सी पर बैठ कर विचार करते रहे कि अब क्या किया जाय। दोस्त ने कहा – यार, आज रात रामलीला में गुजार दो कल सुबह जायेंगे। अंकित – अबे! रामलीला खतम होने वाली है, सब अपने अपने घर जायेंगे तो तू इस सीवान में बैठकर भूतों का भांगड़ा देखेगा? कुछ देर तक अतिथि बनकर बैठे रहे फिर चल दिये, लोग इनके सम्मान में जमीन से उठ कर खड़े हो गये। सभी जानते हैं चित्रकूट क्षेत्र डाकुओं का इलाका है, लेकिन ये बेवकूफ़ नही समझे। सीता खोज में निकले ये दोनों पगले रात में वो गाँव ढूँढ रहे थे जिसमें शादी हो। एक सुनसान रास्ते में, जो कि चारों तरफ घनें पेड़ों से घिरा था, इन्हें कुछ लोग दिखाई दिये। ये उछलते हुए गाँव का पता पूछने के इरादे से उनके पास गये और बोले – भाई साहब आस पास कहीं कोई शादी है क्या? वे डाकू लोग थे। बस होना क्या था, सूट बूट देखकर उन लोगों ने इन्हें डरा धमका कर, चाकू और तमंचे सटाकर इनका सब उतार लिये। बस जांघिया छोड़ दी। किसी तरह ठिठुर कर इन लोगों ने रातें बितायी और भूख के कारण तड़पते रहे। सुबह हुई और कुछ ग्रामीणों ने इन्हें इस हाल में देखा तो समझे कि साले पीकर घूम रहे हैं। लेकिन इन सबने दुखड़ा रोया तो कुछ हृदयवान लोगों ने फटे पुराने कपड़े दिये और कुछ रुपये इस शर्त पर कि वापस आकर दे जाना। और दीदार के प्यासे बिना दीदार के लेकिन समझदार हो कर वापस लौटे। दूसरे दिन ये लोग गाँव वालों के द्वारा की गयी बेइज्जती उतारने, एक सभ्य नागरिक बनकर वापस उस गाँव गये और उधार लिये पैसे चुका दिये साथ ही वो फटे पुराने कपड़े भी…… बाद में उन्होनें ये आप बीती मुझे सुनायी। ज़वाब में मैने कहा – चलो अच्छा हुआ कि तुम्हारे द्वारा दान किये गये 200 रुपये पुण्य में गये बाकी तो डाकू ले गये। रामलीला में अपनी इज्जत बचाने के लिये तुमने दान किया और तुम्हारी इज्जत बच गयी।मुफ्त में जान भी बच गयी। ज्यादातर तो हत्या करके ससुरे लूटते हैं ताकि किसी को पता न चले। शायद वही दान, गाँव वालों की मदद के रूप में तुम लोगों को मिला। वरना आजकल कौन, किसको पूछता है? मेरी बातें सुनकर वे अपने इस कृत्य पर मुस्कुराने लगे। October 22 एक छोटा सा चुटकुला .....एक बार अटल बिहारी , मुशर्रफ , मल्लिका शेरावत और मार्गरेट थेचर , एक साथ ट्रेन में सफर कर रहे थे। ट्रेन एक सुरंग के अंदर से गुजरी , घना अंधेरा छा गया। अटल को पता नही क्या सूझी , उसने अपने हाथ को चूमकर एक जोरदार आवाज निकाली और एक जोरदार झापड़ मुशर्रफ के रसीद कर दिया। सभी ने झापड़ की आवाज़ को सुना। ट्रेन जब सुरंग से बाहर निकली , सबने देखा , मुशर्रफ अपने गाल को सहला रहा था , सभी ने अलग अलग सोचा : मुशर्रफ सोच रहा था : अटल ने मल्लिका को किस किया होगा , गलती से झापड़ मुझे पड़ गया। मल्लिका सोच रही थी : हो सकता है मुशर्रफ ने मेरे को किस करने के चक्कर मे मार्गरेट थैचर को किस कर दिया हो इसलिए पिटा। मार्गरेट सोच रही थीं : ये मुशर्रफ भी ना , गलत जगह हाथ डाल देता है , मुझे किस करता तो , कम से कम , झापड़ तो ना पड़ता ।
October 21 भीड़ में अपना चेहरा दिखाना चाहते हो तो पुकारो अश्लील, अश्लील!!!
हाँ जी! अभी कुछ दिन पहले अमेरिका में इस मुद्दे पर शोध हुआ जिसके नतीजे चौकने वाले रहे। अगर आप भीड़ में उपेक्षित हैं तो बस चिल्ला भर दीजिये – अश्लील, अश्लील……, मेरे घर में अश्लील, मुहल्ले में अश्लील, पड़ोस में अश्लील, ब्लाग में अश्लील, पूरी दुनिया में अश्लील……… तुरन्त ही आप महसूस करेंगे कि भीड़ आप की ओर मुड़ जायेगी। लेकिन शर्त यह है कि अश्लील कायदे का हो। यहाँ हम अपने स्तर से नीचे जाने में सकुचा रहे हैं इसलिये ‘अश्लील’ को अश्लील कह रहे हैं। दरअसल ‘अश्लील’ शब्द, उन शब्दों और वाकयों का निचोड़ है जो कि समाज में खुले आम प्रतिबन्धित हैं। चोरी छिपे या अनुसाशन से करो तो वही शब्द और घटनायें शील हैं, मधुर हैं। तो अश्लील माने क्या होता है? सब जानते हैं, यहाँ परिभाषा बनाने हम नही बैठे हैं। हम तो शोध पत्र जारी करने बैठे है जो सीधे अमेरिका से फैक्स के माध्यम से हमारे पास आया। शोध पत्र की भाषा कठिन है। इसलिये शार्ट में समझाते हैं, जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हम सभी सुंदर वन के प्राणी है। प्राणी हैं इसलिये चीखते भी हैं चिल्लाते भी हैं, मौका मिले तो गाली भी देते हैं। सुंदर वन की खास बात है कि जो कहना है कह भर दो, कोई नियम कानून नही है। इसी कहने के चक्कर में मार हो जाती है, सिर फोड़ौउअल का खेल चल पड़ता है, दूसरी तरफ शांति की बात होती है, मन की शांति, तन की शांति… जब सारी बातें हो जाती हैं तो दिमाग सोचता है कि अब नया क्या? हमने शील की बात कर ली, काफी अच्छे अच्छे लेख लिख डाले, कविता, गज़ल, कहानी सब तो ठूँस दिया सुंदर वन में अब क्या करें? अब तो हालत यह हो गयी है कि कोई पूछता भी नहीं। बस यही से हमारी असली मानवता नज़र आने लगती है, हम उस मुद्दे की तरफ जाते हैं जो समाज मे रहकर देखना भी पसन्द नही करते, परन्तु अकेले देखने को मिल जाय तो क्या कहने…… अरे भाई वही……!! अश्लीलता… भिन्न प्रकार की अश्लीलता… उम्र बीत गयी लेकिन ऐसे शब्द लिखे हुए हमने नही देखे केवल सुने थे लेकिन सुंदर वन की महिमा के चलते उसे लिखा हुआ भी देख लिये…और लिखने वाले कौन? उम्र में हमसे चार गुना बड़े भाई साहब!! और लिखने का कारण? उनको भीड़ चाहिये। भीड़ जुटाने के चक्कर में वो हमें अश्लील शब्द पढ़वाते है कि देखो उसने ऐसा कहा और अपने को साफ जताते हुए वो उस अश्लील को जी भर गालियाँ दे डालते हैं कि समाज में खुले आम अश्लील काम करते हो और भीड़ उनके इस प्रयास की कोटि कोटि प्रशंसा करती है, आखिर भीड़ को भी तो भीड़ चाहिये। भीड़ तो मानव भावनाओं से महिमा मंडित है जहाँ अश्लील और सेक्स की बात होती है उधर अपने आप मुड़ जाती है। इसका भी एक कारण है, सेक्स और अश्लीलता विषय ही ऐसा है कि देख लिया, सुन लिया तो मन में गुदगुदी सी होने लगती है। यह तो मानव की प्रमुख कमजोरी है। इस कमजोरी को एक विशेष मनोवैज्ञानिक तरीके से अपनाते हुए भीड़ को अपने काबू में किया जा सकता है। खुदा न करे कि ऐसा दिन आये जब सुंदर वन के प्राणी जो कि जल्द ही दाखिला लिये हैं वे भी गलियों चौराहों और ऐसी जगहों पर जाये जहाँ अश्लील दिखता है, अश्लील बिकता है और वही से हमारे लिये भी ढेर सारी अश्लीलता बटोर लाये और बोलें – लीजिये सर! आपके लिये फ्री गिफ्ट है। कितने अच्छे विचार से इस सुंदर वन का निर्माण हुआ होगा कि सब पढ़े, सब बढ़े। लेकिन आज जो आगे बढ़ रहा है उनकी टाँग पकड़ कर सब लटक गये हैं। न खाइब न खाये देब! इस समय हम अपनी पसन्द के फल सुंदर वन से चुन चुन कर खा रहे हैं। खाते समय गन्दगी का जिक्र नही करते लेकिन गन्दगी का अस्तित्व तो होता ही है, सब जानते हैं। आखिर, खाते समय गन्दगी की बात छेड़कर आप क्या साबित करना चाहते हैं, कि फलां जगह इस टाइप की गन्दगी है!!? लेकिन आजकल की साइकॉलॉजी समझ पाना कठिन हैं। लेकिन हमने कोशिश की और अमेरिका वालों ने भी की, इस साइकॉलॉजी को समझने की !! सीधी साधी साइकॉलॉजी है कि सुंदर वन की साइकॉलॉजी दूषित हो रही है। सभी साइकॉलॉजी के पीछे एक साइकॉलॉजी है और उसके पीछे दूसरी। इसे इस तरह से समझा जा सकता है – 1) जैसे एक प्राणी ने कुछ अश्लील शब्द आपको समर्पित किये और बोले कि ये अश्लील है, इसे रोका जाना चहिये। इसमें भीड़ जुटाने की साइकॉलॉजी है और ये दिखने की कि हम साफ पाक हैं। 2) दूसरी साइकॉलॉजी यह है कि वह ढेर सारी वाह वाही पायेगा कि क्या बात है, गन्दगी विचारणीय है और साथ ही वह इन्तजार करता है कि कोई आगे आये और मुझे डाँटे कि अश्लील शब्द क्यों लिखे हो। 3) अगर कोई ऐसा नही करता तो वह खुद पर खुद एक अनजान शख्स बनकर एक टिप्पणी करता है और अपने आप को खूब कोसता है – “आपको खुद ऐसा नही लिखना चाहिये।“ 4) इसमें यह साइकॉलॉजी है कि और लोग आये और टिप्पणियों से डाँटे ताकि प्राणी पापुलर हो जाये जिससे प्राणी के बारे में भी लोग लिखें कि कितना बेहूदा है। 5) अच्छे बनकर भीड़ में खो गये इससे अच्छा है कि ऐसे ही दिख कर लोगों के सामने बने रहे, बाद में सफाई भी दे देंगे। 6) भीड़ को भूलने की आदत है, कुछ दिन में भूल जायेगी। प्राणी अब भक्तिमय रचनाये लिखेगा और अनन्य भक्त के रूप में स्थापित हो जायेगा। 7) अगर इसके बवजूद भीड़ नहीं आयी तो पापुलर लोगों पर गालियों की बौछार करता है और उनकी टाँग पकड़कर खींचता है कि उसी के बहाने हम सामने तो रहे। बाल की खाल निकालने से भी नही चूकता। 8) और भी ढेर सारी मलिन साइकॉलॉजी………… तो बाबूजी हमने देख लिया सुंदर वन की गरिमा। ये भी माया का एक जाल है। इस मायाजाल से हम बहुत दूर थे तथा किसी और वन में मस्त होकर जीवन यापन कर रहे थे। एक दिन बड़े भाई साहब ने सुंदर वन की महिमा बताई और हम चले आये………… अब जब आ ही गये हैं तो मेरी साइकॉलॉजी ने भी पलटी मारी होगी। मैने भी यह अश्लील पुराण एक दूषित साइकॉलॉजी के चलते लिखा है…………… इसमें कोई शक नही है। पहले तो सोचते थे कि कितना हसीन सुंदर वन है तरह तरह के फल हैं लेकिन मुझे क्या पता था कि सारे फल बिकते भी हैं। अब जब फल मंडी खोल ही ली है तो शोरगुल तो होगा ही, ग्राहक पकड़ने के लिये। लेकिन कुछ ऐसे भी है जो फल दान करने आते हैं। इसकी मुझे खुशी है। October 20 नीम की पत्तियाँ : लघुकथा
एक छोटा सा गाँव था। उसमें माधव नामक एक बुजुर्ग अपने बेटे सुधीर और बहू लक्ष्मी के साथ रहता था। उसकी बहू बहुत सीधी और समझदार थी जबकि उसका बेटा कुछ अकड़बाज था। दोनों की कुछ साल पहले शादी हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद लक्ष्मी ने घर के सामने एक नीम का पौधा लगाया। वह प्रकृति प्रेमी थी और साथ ही एक सधी विचार वाली गृहणी भी। उसका विचार था कि नीम के पौधे से घर की हवा कीटाणु रहित और स्वच्छ बनी रहेगी।
नीम का छोटा पौधा अच्छी मिट्टी और लक्ष्मी जैसा संरक्षक पाकर लहलहाते हुए बड़ा होने लगा, लेकिन कभी कभी उस छोटे पेड़ की सुकोमल शाखा को सुधीर तोड़ कर दातुन करने लगता। लक्ष्मी ने उसे बहुत समझाया कि अभी दातुन के लिये नीम से शाखायें न तोड़ा करे क्योंकि अभी यह विकसित हो रहा है, परन्तु सुधीर लक्ष्मी को डांट कर चुप करा देता।
अपने आप को कटता, छिलता नीम का पेड़ दुखी होता लेकिन लक्ष्मी का स्नेह देखकर सब कुछ भूल जाता और अपना सिर आसमान की ओर किये उसकी तरफ निरन्तर बढ़ता जाता। नीम के पौधे को इस तरह बढ़ता देख लक्ष्मी फूली न समाती।
एक दिन माधव के पास उसका पड़ोसी आया और उससे नीम की कुछ लकड़ियाँ मागने लगा। माधव ने उसे लकड़ियाँ काटने की छूट दे दी। लक्ष्मी उस समय खेतों में काम कर रही थी, जब तक वह वापस लौटती तब तक पड़ोसी ने नीम की दुर्गति बना दी।
नीम की ऐसी दशा देख लक्ष्मी रो पड़ी और अपने ससुर माधव से रुष्ट हो गयी और बहस कर ली। ज़वाब में उसके ससुर ने कहा कि घर उसका है नीम का पेड़ उसके घर में है वह नीम के साथ चाहे जो करे, वह बोलने वाली कौन होती है। शाम को सुधीर वापस आया, अपने पिता से लक्ष्मी के खिलाफ बातें सुनते ही घर में घुसकर काम कर रही लक्ष्मी को मारने पीटने लगा। यह देख नीम का पेड़ पीड़ा से कराह उठा। स्वयं कटने की पीड़ा उतनी कष्टदायक नही थी।
नीम की देखभाल के चलते लक्ष्मी कई बार अपमानित हुई। उसने यह निश्चय किया कि अब से वह नीम की कोई रखवाली नही करेगी। जिसको जो चाहे सो करे, काटे पीटे, तोड़े मरोड़े चाहे जो करे अब वह किसी को उलाहना नही देगी।
पतझड़ का मौसम आया और नीम की पत्तियाँ जमीन पर गिरने लगीं। नीम की इन पत्तियों को देख माधव बिफर पड़ता और लक्ष्मी से पत्तियाँ बटोरने को कहता। लक्ष्मी - कहती घर आपका है नीम भी आपका है, आप ही नीम के मालिक हैं मैं कौन होती हूँ!!
लक्ष्मी के इस व्यंग्य से माधव चिढ़ जाता और कहता – ‘नीम कटवा कर फेकवा दूंगा’। फिर वह सुधीर से पत्तियाँ साफ करने को कहता। सुधीर बेमन से पत्तियाँ बटोरने लगता और नीम के पेड़ को कोसता।
घर में उपजे इस तनाव और ईर्ष्या के कारण नीम के पेड़ का विकास रूक गया और वह दुर्बल होता चला गया। पतझड़ समाप्त होते होते वह सूख कर मात्र एक ठूंठ रह गया। कुछ दिन बाद माधव ने उस नीम के पेड़ को कटवा दिया। लक्ष्मी उस दिन बहुत रोई थी। अब नीम का पेड़ नहीं रहा।
कुछ महीने गुजर जाने के बाद माधव को चोट लगने से एक बड़ा घाव हो गया। डाक्टर ने कुछ दवाईयाँ दी साथ ही नीम की पत्ती से घाव साफ करने की हिदायत भी दी। माधव ने नीम की पत्ती गाँव में खोजनी शुरु कर दी लेकिन कही भी नीम का पेड़ नही दिखा। नीम की पत्तियों से घाव न धुलने के कारण घाव और बड़ा होता जा रहा था।
एक दिन सुधीर के साथ माधव दूसरे गाँव में जाकर वह नीम की पत्तियाँ खोजने लगा। एक घर के सामने नीम का पेड़ दिखा और माधव ने बिना घर के मालिक से पूछे सुधीर को नीम के पेड़ पर चढ़ा दिया। सुधीर नीम की पत्तियाँ तोड़ तोड़ कर नीचे गिरा रहा था कि अचानक गृहस्वामी ने देख लिया और लाठी लेकर दौड़ पड़ा।
उसे ऐसे आते देख माधव की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी, घाव के चलते वह भाग भी न सका कि एक लाठी उसके सिर पर आ पड़ी। माधव एक ही लाठी में चित्त हो गया। सुधीर डर के मारे पेड़ पर ही बैठा रहा लेकिन घर के और सदस्यों ने मिट्टी का गोला फेक फेक कर उसे नीचे गिरा दिया फिर जम कर धुनाई की। उन लोगों ने मार मार कर दोनों की हड्डी पसली एक कर दी। फिर इस तरफ न दिखने की चेतावनी देकर उन्हें छोड़ दिया गया।
वे रोते कराहते घर आये। लक्ष्मी उनकी यह दुर्दशा देख जल्दी से घावों पर मरहम पट्टी की। उनकी पूरी बात सुनने के बाद उसने एक गहरी साँस ली और आँख में आँसू लाते हुए उसने कटे हुए नीम के जड़ वाले हिस्से को देखा और बोली – ‘काश अपना नीम होता!!!’
माधव के मुँह से रूंआसा सा स्वर निकला – ‘तो नीम की पत्तियाँ भी होती!’ ****************
और हम कहते है कि ससुरे यूँ लात न खाते और न ही लतियाये जाते। :)
(आंशिक सत्य घटना पर आधारित)
नोट - इस लघुकथा से क्या शिक्षा मिलती है? इस प्रश्न को लेकर मैं असमंजस में हूँ। पता नही शिक्षा मिलती भी है या नहीं!! October 18 मैडम जी चोट नही लगी …मेरे घर के ठीक बगल में स्थित स्कूल की खिड़की खुली थी। जहाँ से शोर का शोरबा रिस कर मेरे कानों तक पहुँच रहा था। मैं बच्चों की अटखेलियाँ देखने अपने छत पर आ पहुँचा। छत से खिड़की काफी करीब थी। नजदीक जा कर देखा, कक्षा सात या आठ के विद्यार्थी अपनी कक्षा में मदमस्त होकर उछ्ल कूद कर रहे थे, कुछ झगड़ रहे थे और कुछ बाकायदा हाथ घुमा घुमा कर बोल बतिया रहे थे।
अचानक ही उनके इस कार्य को ग्रहण लग गया और चहु ओर शान्ति स्थापित हो गयी। शायद कोई अध्यापक आ रहा था। मैं वापस लौटा कि कौन भयावह टीचरों का चेहरा देखे, उम्र भर तो देख देख कर पिटते और सुबकते रहे हैं और वैसे भी मास्साब शब्द सुनते ही दिल बैठने लगता है, दिमाग में प्रतिकृति उभर आती है एक मोटे मानव की जिसकी रावण जैसी आवाज़ थी और हँसी तो ऐसी मानो हमें ही डांट रहा है। अध्यापकों से डर का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब कभी मास्साब बाजार में दिख जाते तो हम भीड़ में छिप जाते कि कहीं देख न ले और अगर गाँव की पगडण्डियों पर दूर से ही आते दिख जाते तो हम रास्ते से खेतों में उतर कर पैंट की जिप खोल लेते और पेशाब करने का नाटक करते। उनके करीब आते आते तो पेशाब हो ही जाती, या फिर इस डर से हो जाती कि अभी खड़े देख लेगा तो कल बुरी हालत बनायेगा। उनके गुजर जाने (रास्ते से) के बाद हम वापस रास्ते पर आते और बिना पीछे मुड़े, सरपट घर की तरफ भागते।
बच्चे खड़े होकर अभिवादन किये – “गुड मार्निंग मैडम”। मैडम शब्द सुनकर पाँव ठिठके। हमारे अन्दर पल भर के लिये समाये डर का वजूद नही रहा और शान से वापस पलटे। पलटते ही मैडम जी के उपर निगाह पड़ी, जिस तेजी और शान से वापस मुड़े थे उसी तेजी से मुझे फिर से वापस मुड़ जाना पड़ा। चाल में तेजी लाते हुए हम छत के उस छोर पर चले गये जहाँ से खिड़की नहीं दिखती।
दरअसल बात ये हुई कि ये जो बच्चों की मैडम थी ये कक्षा दो से पाँच तक की मेरी सहपाठिनी थीं। जाहिर है उस समय की हुई कुछ हरकतों से इस उमर में शरम तो होगी ही। कैसी कैसी बचकानी हरकतें होती थीं उस दौरान, याद आते ही चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती है। उस दौर के हम आंशिक प्रतिद्वंद्वी थे वो सभी विषयों की माहिर थी और हम निठल्ले केवल गणित के…………, जब कभी वो गणित में मुझसे ज्यादा अंक पाती तो जीभ निकालकर, अंगूठा दिखाकर मेरा अभिवादन करती और जब मेरी बारी आती तो मैं अपना मुँह खोलकर उसे अपने सारे दाँत दिखा देता। जो कुल मिलाकर तेरह थे, बाकी खेलकूद, लड़ाई झगड़े, साइकिल से गिरकर तोड़ लिये थे। जिसमे से एक सामने वाला दाँत चाकलेट ठूँसने से खराब हो गया था। गलती से अगर वह उसे दिख जाता तो वह मुझे चिढ़ा चिढ़ा कर मेरा कान खा जाती। जिस दिन उस दाँत के टूटने का समय आया मैं प्रफुल्लित हो गया कि अब मेरा खराब वाला दाँत टूट जायेगा लेकिन मुसीबत जल्दी नहीं जाती। दो हफ़्ते तक वह दाँत डुगुर डुगुर हिलता रहा लेकिन कम्बख्त टूटता ही नही था। अगले दिन इन मैडम के द्वारा किये गये उपहास से हम क्रोध में आये और सिल बट्टे का बट्टा उठाया और अपने हिलते दाँत पर दे मारा। वह दाँत तो टूट गया लेकिन बगल वाला दर्द के साथ हिलने लगा लेकिन उस दाँत के जाने की खुशी के सामने दर्द छोटा लगने लगा था।
बट्टे को मुँह पर मारते हुए बड़ी दीदी ने देख लिया था और स्कूल जाकर सबको बता दिया। यहाँ तक कि उस मुसटंडे मास्साब को भी……। अपनी कक्षा में मास्साब ने मुझे खड़ा कराया और मजे लेकर पूछे – “क्या बेटा !, दाँत तोड़ने के लिये कोई और औजार नही मिला क्या?” फिर तो जग हँसाई हुई कि रामचन्द्र का बेटा बट्टे से दाँत तोड़ता है।
इन मैडम जी की लाटरी निकल पड़ी थी जब मौका मिले अपने दाँतों पर कलम ठोंककर चिढ़ा देती। उसके दाँत मोतियों जैसे थे सो दाँतों को लेकर मैं उसे चिढ़ा भी नही पाता लेकिन वह अपनी आदत से बाज़ नही आई जब तक कि पूरी तरह से दाँत निकल नहीं आया।
लेकिन अब वो दिन लद गये। आज पूरे 30 चमचमाते दाँतों का मालिक हूँ बाकी के दो पेंडिंग में हैं।
एक दिन वह अपनी दीदी के साथ मेरे घर आयी। मेरी और उसकी दीदी सहेलियाँ थीं। मेरे पास ताबें के पुराने सिक्कों का अच्छा खासा संग्रह था। जो मेरे लिये प्राणप्रिय था। उस समय मैं उन सिक्कों के साथ खेल रहा था। उसने सिक्कों पर अपनी नज़रें गड़ा दी थीं। उसे ऐसे देखता देख मैनें सिक्कों को समेटा और बाहर निकल गया।
दूसरे दिन कक्षा में दो ताँबे के सिक्के दिखाकर वह मुझे चिढ़ाने लगी। मुझे लगा कि मेरा सिक्का उसने ले लिया है। मैं क्रोधित हो गया। उस समय मास्साब कुछ पढ़ा रहे थे, मैने आव न देखा ताव, झपट पड़ा। उसके बाल खींचकर दो झापड़ लगाये और धक्के देते हुए सिक्के छीन लिये। वह ज़मीन पर गिर पड़ी थी। अचानक हुए इस घटनाक्रम से मास्साब क्रोधित हो गये और मुझ पर डंडे की बारिश करने लगे। कितनी बार उन्होनें सिक्का वापस करने को कहा लेकिन प्रिय चीजें आसानी से नहीं दी जातीं और न ही मैनें वापस किये। मास्साब ने इस ढिठाई के लिये पिताजी से शिकायत करने की चेतावनी दी लेकिन कुछ असर नही हुआ। मास्साब ने उसे समझा बुझा कर चुप करा दिया।
सिक्के लेकर मैं घर आया और डिब्बे खोलकर अपने सिक्के गिनने लगे। परन्तु यह क्या मेरे सिक्के तो पूरे हैं फिर ये किसके हैं हूबहू मेरे सिक्को जैसे!! मैं सोच में पड़ गया। इतने में स्कूल से लौटीं दीदी ने आकर एक चपत लगाई और बोलीं – घर आये सहपाठी के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं जैसा तुमने उस दिन किया??? और तो और दूसरे का सिक्का छींनकर शेर बनते हो? वे सिक्के मैनें दिये थे उसे……। दीदी की आवाज तेज थी, आगबबूला होतीं दीदी उसके घर चली गयी। मैं अपराधियों की तरह सिक्कों के बीच पड़ा रहा।
दूसरे दिन मैनें अपना सिक्कों से भरा डिब्बा उठाया और उसमें दोनों सिक्के डाल कर स्कूल चला गया। स्कूल आकर मै अपने यथा स्थान पर बैठ गया और उस तरफ देखा जिधर वह बैठती थी। लेकिन आज उसकी सीट खाली थी क्योंकि आज वह सबसे पीछे वाली सीट पर बैठी थी। मैं उस समय अपने आप से घृणा कर रहा था। उसके चिढ़ाने से मुझे लगता थ कि मैं कक्षा में हूँ लेकिन आज मैं कुछ अलग थलग पड़ा महसूस कर रहा था।
भोजन अवकाश के समय सारे बच्चे अपना टिफिन खा कर बाहर खेलने चले गये और वह वही कोने में बैठी रही। मैं सिक्कों का डिब्बा लेकर सीधा उसके पास पहुँचा और उसके हाथों मे रख दिया। वह सरक कर एक कोने चली गयी और मुँह फेर लिया। उसने अभी अपना खाना खाया नहीं था। मैं उसकी टिफिन निकालकर खाने लगा। मेरे मुँह से चपर चपर की आवाज सुनते ही उसने नजर घुमाई और मुझे अपना टिफिन खाता देख वह लाल पीली होती मेरा टिफिन उठा लायी और खुद खाने लगी और उसकी जीभ बाहर निकली और अंगूठा उसकी खड़ी मुट्ठी पर नाच उठा। उसके यूँ चिढ़ाने से मुझे अपार खुशी हुई।
छुट्टी के समय उसने सिक्कों का डिब्बा लौटाना चाहा लेकिन मैं उस डिब्बे को पहचानने से इन्कार कर दिया। जवाब में उसने कहा – अच्छा ठीक है, अपना हाथ तो दिखाओ…… कल ज्यादा चोट लगी थी ना !!! मास्साब काफी तेज तेज मार रहे थे … वो अच्छे नही हैं। इतना कहकर वह मेरा हाथ उलटने पलटने लगी। उसके इस व्यवहार ने मेरी आँखों मे पानी ला दिये। मानो मास्साब के डंडे की चोट से हुआ दर्द आज महसूस हो रहा है, और आँखें आँसू के रूप में उस दर्द को पिघला रही हैं। मैं कुछ न कह सका, बस उसके उन गालों को, जिस पर मैने थप्पड़ लगाया था, धीरे से सहलाकर रोता हुआ घर की तरफ दौड़ पड़ा।
उस दिन मैनें भावों की अनुभूति की थी, साथ ही यह जाना था कि प्रेम अंतःस्थल में रहता है जिसे देखा नही जा सकता और यह भी जाना कि सिक्कों की भाँति स्नेह को गिना नही जा सकता। वास्तव में मैने असली सिक्के पा लिये थे। जिसे न कोई छीन सकता है न ही कोई चुरा सकता है। और दूसरे दिन से ही उसने अपना मोर्चा सँभाल लिया……………
मुझे कभी कभी मास्साब भी चिढ़ाते – “क्या रे सिक्काचोर, गृहकार्य करके आया है?”
कक्षा पाँच के बाद वह कहीं चली गयी। शायद उसके पिता जी का स्थानांतरण हो गया था।
उन दिनों के बाद अचानक ऐसे दिख जाने से पहले पहल तो झेंप जाना स्वाभाविक है। मैं कुछ सोच कर वापस स्कूल की खिड़की तक पहुँचा। मैनें छिपकर, चोर निगाहों से उसे देखा। वह काफी खूबसूरत हो गयी है लेकिन बचपन में कुछ ज्यादा ही थी, दूध जैसे तो गाल ही थे और काजल से घिरी वो बड़ी आँखें ……। चेहरे में खास परिवर्तन नहीं आया। अभी विश्लेषण कर रहा था कि ………
एक विचार उठा कि क्या मैं उसके सामने जाकर बीती बातें दोहराऊँ? क्या वे बातें उसके मन में आज भी उतनी ताजी होंगी? शायद गुजरते समय के साथ वह सब भूल गयी होगी और पहचानने से इन्कार कर दे………
हो सकता है कि वो मुझे पहचाने और फीकी हँसी हँसे और पूछे – कैसे हो, कहाँ हो, क्या कर रहे हो? मैं उसे प्रश्नों के ज़वाब भर देता रहूँ ………… मैं उसकी उन भोली यादों के साथ छेड़खानी बिल्कुल नही चाहता था। जैसा है वैसा रहने दिया जाय अब और कोई परिवर्तन नही। उससे मिलने की बात छोड़कर उसके क्रियाकलाप देखने लगा। वह हाथ में किताब लिये गणित पढ़ा रही थी ……… कुछ प्रश्न श्यामपट्ट पर लिख कर वह कुर्सी पर बैठ गयी। कि अचानक वह तुनक कर उठी और एक बच्चे को डांटते हुए बाहर बुलाया और कुछ पूछताछ करके छड़ी उठाई और उसके हाथों पर दो छड़ी लगाते हुए बोली जाओ बैठो लेकिन अब शरारत मत करना। वह बच्चा हँसने लगा। वह फ़िर गुस्साई और तेज आवाज में पूछी – क्यों हँस रहे हो? बच्चा बोला - मैडम जी चोट नही लगी …… October 17 गूँजती चीत्कार … अन्तःस्थल के बीच …
हम कौन हैं, क्या हैं, कहाँ हैं? कभी कभी दुनिया के शोरगुल के बीच ये प्रश्न हमारे जेहन में आ खड़े होते हैं। बाल्यावस्था, किशोरावस्था पार कर हम यहाँ तक आ पहुँचे हैं जहाँ हमारी महत्वाकांक्षाओं और अपनों की अपेक्षाओं के बोझ तले हमारा अस्तित्व चरमरा रहा है।
हममें कुछ खास करने की चाहत है, हम कुछ खास बनना चहते हैं। पर किस तरह? इसका उत्तर बताने वाला कोई नहीं।
माँ बाप हमें आसमान की बुलंदियों पर देखना चाहते है लेकिन हमारे दिल का हाल जानने के लिये उनके पास वक्त नहीं है। पढ़ाई या अन्य खरचों के लिये धन जुटा देना यही उनके लिये सब कुछ है। समय समय पर हमें चेताते और जताते भी रहते हैं कि मैनें तुम्हारे लिये क्या क्या नहीं किया। तुम्हारे लिये क्या सुविधाएँ और सहूलियतें जुटाईं। उनकी इन बातों के बोझ से उनके लाडले का मन कितना दबा जा रहा है, इसकी उन्हें खबर भी नहीं होती।
हम उस दहलीज पर हैं जहाँ शरीर और मन में परिवर्तनों का दौर होता है। परिवर्तन आकृति में आते हैं और प्रकृति में भी। परिवर्तनों के साथ मन की चाहते भी बदलती रहती हैं। कल्पनाओं और आकांक्षाओं का नया संसार शुरु होता है। हम इसे बताना तो चाहते हैं पर कोई सुनने को तैयार ही नही होता।
हाँ, बात बात में अपने माँ बाप से झिड़कियाँ ज़रूर सुनने को मिल जाती हैं। जैसे – अब तुम छोटे नही रहे बड़े हो गये हो, तुम्हें सोचना चाहिये, समझना चाहिये, कम से कम अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिये, बहुत खेल लिये अब तो सुधरो।
ज़वाब में हम भी कुछ कहना चाहतें हैं परन्तु हमारी आवाज़ मन के कोनों में ही गूँज कर रह जाती है।
इसी आयु में पढ़ाई और कैरियर की दिशा तय होती है। इंजीनियरी, डाक्टरी, प्रबंधन, कम्प्यूटर या अन्य कोई राह। इस दिशा एवं विषयों के चयन में बहुत कम माता पिता ऐसे होते हैं जो बेटे या बेटी की रुचि अथवा उसकी आंतरिक संभावनाओं का खयाल रखते हैं। प्राय: इस संबंध में अभिभावकों की दमित आकांक्षाएं ही उजागर होती हैं। फलाने का लड़का इन्जीनियर या डाक्टर बन गया तो इन्हें भी अपना लड़का इन्जीनियर या डाक्टर नज़र आता है। इसी आधार पर तय होता है कि क्या पढ़ना है और हम उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं। आखिर उन्हीं के पैसों पर उनको ज़िन्दगी जो जीनी है।
यहीं से शुरु होता है बेमेल जीवन का दर्द। रुचि, प्रकृति एवं संभावनाओं के विपरीत पढ़ाई का चयन कुंठा को जन्म देता है। मन का मेल न होने से इस पढ़ाई में स्वाभाविक रूप से कम अंक मिलते हैं।
तब हमें सुननी पड़ती है अभिभावक से कड़ी फटकार। सुनने को मिलते हैं अपने नाकारा होने के किस्से। लगभग रोज ही प्राप्त होते हैं अपने निकम्मेपन के प्रमाणपत्र। बार बार की जाती है स्फल लोगो से तुलना। किसी गणितीय समीकरण की तरह यह विविध रूप से सिद्ध किया जाता है कि हम कितने गए-गुज़रे हैं।
कभी कभी हमारे मन में अपने अभिभावक के प्रति गहरा डर समा जाता है जिससे हम उनसे कटते हैं कतराते हैं। साथ ही निराशा और चिंता मन में गहरी होती जाती है। मन चीखता है पर यह चीख अंदर ही रह जाती है। इस अवस्था में हम भावनात्मक रूप से अपने को बहुत अकेला पाते हैं। हमें तलाश होती है अपनेपन की। इसी तलाश का फायदा कुछ स्वार्थी जन अपने लाभ के लिये उठा लेते हैं तथा और भी गहरे गर्त में धकेल कर निकल लेते हैं।
घर में हमारी खुद की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं रखता और विश्वविद्यालय में शिक्षा व्यवस्था का हमारी निजी ज़िन्दगी, स्वास्थय या हमारे मन की उलझनों से कोई मतलब नहीं होता। मरो चाहे जीयो लेकिन परीक्षा दो। कुछ कहने – बताने या जताने पर ताने – व्यंग्य या कटूक्तियों के कंटक ही हमारे पल्ले पड़ते हैं। आखिर मनोरोग और व्यवहारिक विकृतियॉ ऐसे ही तो पनपतीं हैं।
वास्तव में माँ बाप के लिये हम वही पगलेठ बने रहते हैं जो पहले थे, समय के साथ हमारे अन्दर हुए भावनात्मक और मानसिक परिवर्तन उन्हें नहीं दिखते। हम खुद उनके सामने बच्चे ही बने रहते हैं, परन्तु ज़रा सा बड़े बनकर उनसे विपरीत बात की तो नसीहत दी जाती है कि बड़ों से कैसे बात की जाती है।
हम वो युवा नहीं जो अपने यौवन को शराब में डुबोकर घुलाते हैं या सिगरेट के धुएं में उड़ाते हैं। हम अध्यात्मिक दृष्टि रखने वाले युवा हैं। यहाँ अध्यात्मिक दृष्टि का मतलब किसी पूजा पाठ, ग्रह शांति, अंगूठी, ताबीज, लाकेट या धर्म से नहीं है, इसका अर्थ तो जिन्दगी की सही और संपूर्ण समझ है। जिसके लिये हम प्रयासरत हैं।
अभिभावक जिन्हें अपने स्वार्थ से मतलब है, वे हमारे लिये केवल पैसा जुटाते हैं। ज्यादा कुछ हुआ तो हमारी महत्वाकांक्षाओं के घास फूस में चिंगारी लगाते हैं। उन्हें अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, परिचितों से यह बताने में बेहद खुशी मिलती है कि उनका बेटा इंजीनियरी, डाक्टरी या प्रबंधन की पढ़ाई कर रहा है। पास होते ही बड़ी नौकरी लग जायेगी और कुबेर का खजाना लाकर घर में रख देगा। यदि काफी बातें हुईं तो बस जिम्मेदारी नैतिकता की एक घुट्टी पिला देते हैं।
जो दोस्त हैं वे टाइमपास हैं,क्योंकि सभी अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं के घोड़ों पर सरपट दौड़ रहे हैं। बहुत अच्छी मुलाक़ातों के बावजूद किसी को किसी के मन में झाँकने की फुर्सत नहीं है। इससे अच्छी तो अन्तर्जाल की गोल दुनिया है जहाँ हम अपना समय गुजार लेते हैं और अपने मन के उद्गार लिख छोड़ते हैं। एक आध हैं जैसे – त्रिभुवन जी और सौरभ जी, जो कभी कभार इस विषय पर चर्चा कर लेते हैं बाकी सब अपनी दौड़ गिरते, सँभलते, रोते, गाते दौड़ रहे हैं। फिर भी चर्चा समाधान नही है।
ज़िन्दगी अपेक्षाओं, आकांक्षाओं और जिम्मेदारियों के बोझ तले पिस रही है। मन की कोमल संवेदनाएं कुम्हला रही हैं।
आदर्श की बात सभी करते हैं। माँ बाप, रिश्तेदार, शिक्षक और पुस्तकें, जो भी होता है आदर्शों की सीख देने से नहीं चूकता, परन्तु कहीं कोई यह बताने वाला नहीं है कि आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रक्रिया क्या हो।
हमें कोई बताए तो सही कि हम उलझनों से कैसे बाहर निकलें। कोई हमें सुनने वाला तो हो। हमें तो बस डांटने, समझाने और नसीहत देने वाले मिलते हैं। October 16 चाँद के पार चलोखुला आसमान, जिस पर कुछ धूमिल तारे अपनी टिमटिमाहट से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, क्योंकि आज चाँद अपना पूरा लिबास पहन कर आया है और ये आकाश से गिरती अदृश्य ओस की बूँदें मुझे चेता रही हैं कि कुछ ओढ़ लो वरना सुबह तक ओढ़ लोगे। रजाई में लिपटे छींकोगे और गला फाड़ कर खांसोगे। आज कुछ ज्यादा ही धार्मिक स्थलों की सैर हो गयी। सुबह उठते ही भैरव बाबा, जो कि घर से 40 किमी दूर हैं, के दर्शन को चले गये थे उधर ही गुरु बाबा की पुण्यस्थली भी थी वहाँ भी चले गये। लौटते समय दीदी की ससुराल तक चले गये। नतीजन शाम तक हालत पंचर हो गयी थी। आज पूर्णिमा की मन भावन रात है और बाल्मीकि जी का हैप्पी बर्थडे भी है। मन में विचार आया कि सभी पुण्यात्मायें पूर्णिमा के दिन ही धरती पर अवतरित हुई है और एक हम पाप के सौदागर ठहरे जो सात दिन पहले ही टपक पड़े। पूनम की हसीन रात मधुर चाँदनी बिखेर रही थी। इस चाँदनी के चक्कर में मैं अपना बिस्तर छत पर उठा लाया था। चूँकि अभी तक अपने घर (आज़मगढ़) रहकर आराम फरमा रहा हूँ तो लाज़मी है कि बड़े मेरे इस हसीन विचार में अपनी टांग अड़ाये। नीचे से पिता जी की क्रूर आवाज आयी। जिसमें यह सन्देश था कि नीचे आकर निद्रा का आनंद उठाओ वरना वे उपर आकर मेरे आनंद में बाधा पहुँचायेंगे। पिता श्री की बातों से प्रेरित होकर माता जी ने भी आवाज लगाई – उपर हंडा गाड़े हो का? लेकिन आजकल पटाना हर किसी को आता है केवल मुझे छोड़कर। इस बात का पता मुझे आज ही चला हांलाकि शक पहले से ही था। जब मैनें अपने माता-पिता को समझाना चाहा तो वे और उखड़ गये। “चाँदनी लुत्फ़” के लिये विह्वल मन मुझे छोटे भाई तक खींच ले गया। मैने उसे अपनी इच्छा बताई तो उसने मेरे लिये माता पिता से बात की और आश्चर्य की बात ये रही कि माँ बाप मान गये लेकिन इस बात का तनिक भी आश्चर्य नही रहा कि छोटे ने कैसी-कैसी मन लुभावन बात माता पिता से कही। उसका ये पैदाइशी गुण है। नीचे वाली सदन में उपर आने का प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद मैनें आसन (बिस्तर) ग्रहण किया और उपर आसमान में लटक रहे चाँद पर अपनी आँखे गड़ा दी। ग्रामीण इलाका होने के कारण काफी शन्ति थी। पेड़ पर बैठे झींगुर अपना राग अलाप रहे थे, कुछ सियार और कुत्ते आपस में गाली गलौज किये जा रहे थे। सामने ही पुराना पीपल का पेड़ था, मेरे घर वालों का मानना था कि उस पर कुछ आत्मायें हैं जो रात में विचरण करती हैं। एक नज़र उसे भी देखा। डर पहले से हो तो ऐश्वर्य राय भी डरावनी दिखेगीं। किसी भूतनी की तरह्। राय साहब जो कि अब बच्चन साहब के मत्थे जड़ दी गयी हैं उनका ध्यान आते ही मुझे अपनी राय साहब याद आ गयी। हाय! क्या सूरत थी… और सीरत तो मुफ्त में मिली थी। कम्बख्त ! अगर पटाना सीख लिया होता तो कम से कम ये वेदना तो न होती। कितनी बार हरे सिगनल मिले परन्तु … पागल प्रेमी पूर्णतया वर्णान्धता के शिकार होते हैं, हरे और लाल में खास फर्क़ नही दिखता सो मुझे भी नही दिखा। लाल और हरा तो बहाना है, दम तो थी नही मजनू बनने की … संस्कारों की बेड़ियाँ, समाज में बने रहने की लालसा, इज्जत, और भी बाकी इसी टाइप की चीजें बहाना मारने के काम आती हैं कि अगर ये न होती तो जाकर बोल दिया होता …… लेकिन हक़ीकत कुछ और ही होती है। ओशो ने इस कुंठा को बाकायदा समझाया है। कुछ देर तक दूर स्थित सामने वाली खिड़की पर नज़रें गड़ाये इसी द्वंद में उलझा रहा। चाँद एक बार फिर सामने था और ओस की कोमल ठंडक मेरे चेहरे पर। चाँद की गोलाकार आकृति को देख कर ज्यामिति के कुछ प्रश्न जेहन में आ घुसे और दिख रहे चाँद की त्रिज्या की माप तौल शुरु हो गयी। अभी परिधि की माप आयी नहीं कि कहीं दूर जाते वाहन में बज रहे एक गीत के बोल कान में घुस गये चाँद के पार चलो …… चाँद के पार चलो …… दिमाग घूम गया। त्रिज्या दूर रह गयी और ताजा ताजा घुसे इस वाक्य की जाँच पड़ताल विश्लेषी दिमाग ने शुरु कर दिया। प्रश्न उठा कि – ऐं… !??!? चाँद के पार चलो ?!! श्रृंगार रस में इसकी क्या महत्ता? जो पागल प्रेमी जोड़े चाँद के पार जाने को आतुर हो गये। अभी तक आर जाने में नानी मरती है ये पार जा रहे हैं। फिर भी मैनें अपने दिमाग के डाटाबेस में इस फुटेज को डालकर सर्च मारा। दिमाग ने अपने पास रखी फाइलों को चेक किया लेकिन श्रृंगार रस से जुड़ी कोई भी साहित्यिक जानकारी नही मिली। तत्पश्चात् मैने एडवांस सर्च किया कि चाँद से जुड़ी हर एक फाइल बाहर ले आओ और धड़ाधड़ जानकारी मिलनी शुरू हो गयी। सर्वप्रथम हमारे नील भैया दाँत निपोरे साक्षात खड़े हो गये बोले चाँद पर सबसे पहले मैं उतरा। हम उनकी सूरत देखते आगे बढ़े और नवीनतम जानकारी उलटने पलटने लगे। एक फाइल में हमारे देश का प्रथम, डिब्बेनुमा आकार वाला, चन्द्रयान सुशोभित था जिसे दिखा कर नायर साहब उछल रहे थे। दूसरे हिस्से मे लिखा था कि कुछ वैज्ञानिक धरती के नीचे एक बड़े होल में बैठ कर ब्लैक होल बना रहे हैं, जिससे डरपोक टाइप के प्राणी चीख रहे हैं कि विनाश हो जायेगा, आकाशगंगा नष्ट हो जायेगी। हमने प्रोसेसिंग रोक कर ज़रा दम लिया और सोचा कि अच्छा हो अगर ऐसा हो सबको एक साथ परमधाम की प्राप्ति हो जायेगी। जनम मरण के चक्र से सब मुक्त हो जायेंगे। अभी यही तक आया कि प्रोसेसिंग फिर शुरु हुई और प्रतिउत्तर में ज़वाब मिला – “नही बेटा कुछ दिन पहले ताप वृद्धि के चलते परियोजना रोक दी गयी है” हम कहे – सत्यानाश हो इसका, लगता है कभी मुक्ति नही मिलेगी। विज्ञान रस में डूबे दिमाग को एक और विज्ञान मुहर लगी फाइल मिली। बचपन से यही बोझ लादे लादे घूम रहे हैं ऐसी फाइलें मिलना लाज़मी है। मैंने फाइल चेक की जिस पर ये मुद्रित था कि चाँद अपनी धुरी पर नही घूमता नतीजन चाँद के पार मतलब चाँद के दूसरे भाग में (जो हमें नही दिखता) सदा सर्वदा अंधेरा विराजमान रहता है। जानकारी पढ़कर चेहरे पर मुश्कान आई। अच्छा !! चाँद के पार हमेशा अन्धेरा होता है, मतलब ‘ससुरे’ अन्धेरे में जाने को कहते हैं और अन्धेरा कैसा जो कभी खत्म न हो। वाह ! वाह रे प्रेमी खोपड़ी, मान गये “जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि” ‘ससुरों का दिमाग तो देखो’, कैसी गहरी बात करते हैं। पगलेठ लोग तो बूझ ही नही पायेंगे वो तो सोचेंगे कि जाय सब कम से कम धरती का बोझ तो खत्म हो चाँद के इस पार जाय चाहे उस पार … “चाँद के पार” जाकर प्रेमी नामक जन्तु की बांछे खिल जायेंगी। कैसे कैसे कृत्य होंगे चाँद के पार जाकर … राम ही जाने … या हो सकता है कि वहाँ भूतों का राज हो जो इन्हें पकड़कर अपने सरदार गब्बर भाई के यहाँ ले जाये और बसन्ती का नाच गाना शुरु हो। खैर जो भी हो … वहाँ तो प्रेम की अविरल धारा बहती होगी। धारा तो धरती के पार्कों में भी बहती है, जो दिन दहाड़े चाँद के पार का लुत्फ देती है। पार्क की घनी झाड़ियाँ ही प्रेमी समुदाय का ‘चाँद का पार वाला’ हिस्सा है। जिसमे वे रमे होते हैं। जनता से मिली जानकारी के अनुसार … सुना है कि ट्रेनों में भी ये धारा बहा करती है। जिसे देख जनता का मन भी मचल जाता है कि वो भी एक बार चाँद के पार हो आये, लेकिन भौतिक और भौगोलिक कारणों से निराश होकर वे पहाड़ पार हो आये। जनता चतुर है। रात काफी हो चली थी। मैने फालतू घूम रहे दिमाग को नियंत्रित किया और राम का नाम लेकर सो गया। राम का नाम लेना ज़रूरी था, क्या पता पीपल वाला भूत रात में किसी दूसरे लोक की सैर करा दे। वहम ही सही, राम जी से प्रोटेक्शन लेने में क्या हिचकना …
September 14 ज़रा इन्हें भी जानिए …ये हैं चूहा और चिड़िया लेख के नायक। मैनें इन्हीं के बारे में बात की थी। पहली मर्तबा जब इनसे मुलाकात हुई तो ये जनाब बहुत शर्मीले टाइप के लगे। ये बगल वाले कमरे में बतौर किरायेदार हैं और हम लोगों के पड़ोसी भी। पढ़ाई के शान्त महौल में जब इनकी किलकारियाँ सुनने को मिलती हैं तो दिमाग अनायास ही उस तरफ चला जाता है। इनकी किलकारियों में ढेर सारे प्रश्न होते हैं, जितने प्रश्न मैने अपने जीवन काल मे हल किये होंगे उतने तो ये एक ही दिन में पूछ डालते हैं। अगर किसी को बेसिक प्रश्नों के भण्डार चाहिये तो इनसे आकर मिल ले। अपने फुर्सतिया समय में ये अपने अनोखे प्रश्नों से अपनी मम्मी का सिर खाते हैं और अति हो जाने पर एक झापड़ मम्मी की तरफ से मिलता है और प्रश्नों के स्थान पर चिल्लाने की आवाज आ जाती है। पिछली बार ये चूहा और चिड़िया को लेकर कन्फ्यूज थे। अबकी बार या कहे हर रोज अपने एक प्रश्न से बखेड़ा खड़ा कर देते हैं। अभी कल रात की बात है इनको दूध पीने की तीव्र इच्छा जाग उठी। बोले – मम्मी दूध चाहिये। मम्मी दूध गरम करने लगी लेकिन इनको इन्तजार बिल्कुल पसन्द नही। चीख कर बोले – मम्म्म्म्मी दूऊऊऊध ………। मम्मी बोली - बेटा दूध गरम हो रहा है। ये थोड़ी देर चुप रहे। फ़िर चीखे – मम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्मी मैने कहा दूऊऊऊऊऊऊउध …………। अबकी बार मम्मी का धैर्य छूटा और झापड़ रसीद करने के इरादे से किचन से बाहर आईं और बोली – चिल्ला क्यों रहे हो??????? इन्हें जब लगा कि अब मार पड़ेगी तो एक लम्बी मुस्कान लाते हुए बोले – मजाक कर रहा था। इनका यह लुभावना शब्द सुनकर सभी को गुदगुदी होने लगी और कोई भी अपनी हँसी रोक न सका। वैसे भी अभी इनकी आवाज में तोतलापन है जो बातों को और भी मजेदार बना देता है। पिछले दिनों ये शर्माते शर्माते मुझसे बोलने बतियाने लगे और अपने प्रश्न का पिटारा मेरे सम्मुख भी रख दिये। पहले मैं सोचता था कि ऐसे बच्चे बड़े ही होनहार होते हैं इनको सही गाइड लाइन मिल जाये तो ये कोई न कोई आविष्कार कर दे लेकिन उस दिन मुझे ऐसा लगा कि इनकी मम्मी सही हैं और मैं गलत। इनको लतियाना ही उचित है। उनके प्रति मेरी इस सोच में उनके प्रश्नों द्वारा मिली झल्लाहट थी। बाद में मुझे एहसास हुआ कि ये तो मेरी कमजोरी है। वास्तव में मैं इन्हें समझा नही सकता। अब इनके प्रश्न ही ऐसे होते हैं कि उत्तर सूझता ही नही या तो सही बात बतायें या फिर बहका दें जो कि उचित नही है। कुछ प्रश्न … दूध सफेद क्यों होता है ? अब इसका उत्तर बताने से पहले इन्हें रसायन शस्त्र पढ़ाना होगा। बल्ब जलता क्यों है? पंखा चलता क्यों है? ये सब समझाने के लिये इन्हें भौतिकी का ज्ञाता बनाना पड़ेगा। इनके प्रश्न मे एक प्रश्न शामिल है जो कि प्रश्नों का अम्बार लगाने के लिये काफी है वो है – “ये क्या है?” “ये क्या है?” से सिलसिला चलता है और पता नही कहाँ पहुँच जाता है। ये तो रही इनकी पहली खूबी दूसरी खूबी तो और मजेदार है। ये पैदा होने से पहले ही सामाजिकता में पीएचडी कर लिये थे। मैं तो सोच कर दंग रह जाता हूँ कि ऐसी बाते ये छोटे जनाब कैसे जानते हैं। एक बार मैं कपड़ो को स्त्री कर रहा था कि अचानक कुछ खराबी आ गयी। मैने ये बात ऐसे ही इनसे कह दिया ये तुरन्त ही बोले मेरा तो खो गया है नही तो लाकर दे देता। एक दिन मैं बालकनी में बैठा शाम के कुछ बादल देख रहा था कि ये आये और बतियाने लगे। मैने एक उड़ती हुए बड़ी तितली को देखा और इनसे पूछ बैठा – ये क्या है? ये बोले – मच्छर !!! मैं हँसने लगा। तो ये तपाक से बोले – हँस क्यों रहे हैं मैं तो मजाक कर रहा था। अभी कुछ देर पहले हमारे मित्र भूला राही जी भूले भटके मेरे यहाँ पधारे और अपने हाथों से दही को लस्सी मे परिवर्तित करके खुद पिये और मुझे भी पिलाये। इतने में नन्हें सरकार एक फोटू वाला एलबम लहराते हुए आये और दिखाने लगे। मैं चित्रों को देखने लगा और जब इनकी फोटो आई तो बोले – धीरे धीरे देखिये। जल्दी-जल्दी क्यों देख रहे हैं। महान हैं आजकल के बच्चे और इस महानता मे ये छोटे सरकार सर्वोपरि हैं। इन्ही के बहाने अर्धशतक लगाने का भी मौका मिल गया। ------------> हिन्दी अपनी मातृ भाषा है। इसे प्रज्ज्वलित रखना हम सबका कर्तव्य है। (हिंदी दिवस ………………) September 08 प्रेरणा के श्रोत5 सितम्बर का दिन, आज सुबह 4:00 बजे ही जग कर स्नान पूजा पाठ और ध्यान किया। इसके पश्चात संगम तक टहल आने की इच्छा हुई। संगम पर स्थित बड़े हनुमान जी के दर्शन करने के बाद मैं वापस अपने कमरे पर लौट आया। कुछ किताबों में सिर खपाने के बाद भोजन बनाया और बाकायदा खा पीकर कालेज के लिये प्रस्थान किया।
कालेज तक पहुँचने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है पहले तो साइकिल भण्डार से अपनी साइकिल को सही सलामत निकालना पड़ता है निकल गयी तो यह देखना पड़ता है कि हवा पानी है कि नही अगर है तो ठीक, नही तो जेब टटोलनी पड़ती है कि छुट्टे पैसे हैं कि नहीं… सब इन्तजामात करने के पश्चात साइकिल पर सवार होकर उसे खीचते खीचते मुख्य सड़क पर आना होता है। सड़क पर आते ही कुछ गति साइकिल पकड़ती है और मन गुनगुनाने लगता है “डम डम डिगा डिगा …”। अभी मन गुनगुना ही रहा होता है कि सामने से प्रेमिकाओं (भैंसों) का एक बड़ा झुण्ड दिख पड़ता है ये प्रेमिकायें सुबह सुबह ही बाँध के उस पार स्थित सरोवर के निर्मल जल से सराबोर होकर रास्ता रोकने हर रोज ही चली आती हैं। कुछ तो मेरे आगे जाने के विरोध में सड़क पर ही पसर जाती हैं और कुछ मोतियों (कीचड़) से सना अपना पल्लू (पूँछ) मेरे मुँह पर दे मारती हैं। इन सब से लड़ता भिड़ता किसी तरह अपने कालेज पहुँचता हूँ। लेकिन यहाँ भी एक परेशानी खड़ी हो गयी है पहले अपने जे के इंस्टीट्यूट तक अपना साधन ले जाने की इजाजत थी लेकिन अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन के चलते अपना सब कुछ मुख्य द्वार पर ही छोड़कर आगे बढ़ना होता है। टोकन है तो ठीक नही तो छुट्टे के लिये फिर जेब टटोलिये और दो रूपये देकर आप अपनी साइकिल स्टैंड में खड़ा कीजिये। मुख्य द्वार से अपनी कक्षा तक जाते जाते ऐसा महसूस होता है कि विश्व के चार चक्कर लगा लिये। ऐसा महसूस होना भी चाहिये आखिर आजकल लोग ज्यादा पैदल चला ही कहाँ करते हैं। इन सब हालातों से गुजरते आज मैनें कक्षा में धीरे से झाँका कि कहीं सिन्हा सर आ तो नही गये। लेकिन अभी तक सिन्हा सर पधारे नही थे केवल कुछ छात्र ही दिखे। आज मौसम सुबह से ही खुशनुमा था बादलों से पूरा आसमान ढका था और कुछ बूँदे रह रह कर टपक पड़ती थी। कक्षा में प्रवेश करने के बाद मैने अपनी सीट पकड़ ली। कुछ छात्र ब्लैकबोर्ड पर फूल पत्ती बना रहे थे, टीचर्स डे के अवसर पर। कुछ देर तक उनकी कलाकृतियाँ देखने के पश्चात मैनें अपनी आँखों को विश्राम दिया। कुछ देर बाद सिन्हा सर कक्षा में प्रवेश किये और हम सबने उन्हें विश किया। कक्षा में कम छात्रों को देखते हुए उन्होनें कुछ देर बाद अध्ययन प्रक्रिया शुरू करने की बात कही और अपने कुछ विचार हम लोगों के साथ बाँटना शुरू किये। आज उनकी बातें बहुत प्रेरणादायक थी और हमेशा ही रहती हैं लेकिन आज की बात कुछ अलग थी कुछ संवेदना थी कुछ लचक थी उनकी बातों में। आज उन्होनें अपनी यादों को हमारे सम्मुख रखा। जिसमें त्याग की सुगंध थी। आज से पहले मैनें उनके जीवन में इतना नही सुना था। एक सुखी इन्सान के पास जो होना चाहिये वह है उनके पास। लेकिन जो कर सकने की तमन्ना उनके हृदय में है शायद अभी वह बाकी ही है। छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति उनका समर्पण पूज्यनीय है। आज जो बातें उन्होने बतायी उनसे एक सबक लिया जा सकता है। वैसे भी चैट के दौरान विदेशों में रह रहे उनके भूतपूर्व छात्र अकसर उनके बारे में पूछते हैं और इनकी बातें जानने का मौका मिलता है।
लेकिन आज उन्होनें अपने पिता जी के बारे में कुछ बातें बताईं जिसे सुनकर आत्मविश़्वास बढ़ा और इस आत्मविश्वास ने मुझे वे दिन याद दिला दिये जब मैं चार साल का था और उन दिनों अपनी नानी के यहाँ था। नानी के घर के पीछे ही छोटा सा प्राइमरी स्कूल था और उस स्कूल के पण्डित जी मेरे नाना के परम मित्र थे। उनका घर चार कोस दूर था। रोज़ आना जाना मेरे नाना जी को अच्छा नही लगता सो पंण्डित जी को अपने यहाँ ही रोक लेते और शनिवार को ही मुक्त करते। नानी का घर चारों तरफ लगे बाग के बीचोंबीच था और जंगल की एक कुटी जैसा दिखता। गाँव की शुरूआत तीन चार बाग छोड़कर शुरू होती। पंण्डित जी का मन ऐसे महौल में ज्यादा रमता और मेरा भी। नाना जी ने खास हिदायत दे रखी थी कि हम लोगों को पण्डित जी से पढ़ना है। लेकिन हम लोग (मैं और दीदी) इस झंझट से दूर रंगीन तितलियाँ पकड़ने में पूरा समय बिताते और कच्चे आम को सुतुही (बड़े सीप को घिस कर बनाई गयी छिलनी) से छील कर खाते। बागीचे के दूसरे छोर पर जहाँ से खेतों की शुरुआत होती थी वहाँ पर हमारे नाना जी की एक मध्यम आकार की झोपड़ी थी जहाँ वे सोते और दिन भर खेतों पर नजर रखते। वही बगल में ही पण्डित जी के लिये भी एक कुटिया नाना जी ने बनवा दी थी। सुबह होते ही पण्डित जी नहा धोकर रामचरितमानस का पाठ शुरु कर देते और नाना जी हम लोगों को जगा कर वहाँ ले जाते। उनका मानना था कि सुबह के समय पढ़ी गयी चीजें याद रहती हैं पहले तो हम लोग वही बैठ कर उनका पाठ सुनते फिर पण्डित जी हम लोगों को वर्णमाला के अक्षर बताते फिर गिनती और पहाड़े। यही क्रम रोज़ चलता लेकिन एक दिन मैं चुपके से उनकी कुटिया मे घुस गया और उनकी किताबें टटोलने लगा। एक मोटी सी किताब को देख कर मैं आश्चर्य चकित रह गया और उस दिन जाना कि किताबें मोटी भी होती हैं। उसे उठाकर उसे उलटने पलटने लगा उसमे कुछ अलग अक्षर लिखे थे। वर्णमाला वाले अक्षर कही नही दिखे। इतने में पण्डित जी पूजा समाप्त करने वाला दोहा पढ़ने लगे और मैं भाग कर बाहर आ गया। उस दिन मैं दीदी से बताया कि पण्डित नाना के पास ढेर सारी किताबे हैं और उसमे अजीब अजीब लिखा होता है। दीदी भी मेरी तरह खोजी प्रवित्ति की थीं नतीजन दोपहर के समय हम लोग घूमने का विचार छोड़ कर पण्डित जी के कुटी पर धावा बोल दिये और किताबों को उलटने पलटने लगे मैं तो एक किताब लेकर बैठ गया और उसमें छपे जीव जन्तुओं के चित्र देखने लगा। शाम तक हम लोग केवल चित्र ही देखते रहे कि अचानक पण्डित जी आ गये। हम लोग डर गये कि आज जबर्दस्त डाँट पड़ेगी लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ पण्डित जी आये और बगल में बैठ गये। सिर पर हाथ फेरते बोले – “पढ़ाई हो रही है?” दीदी ने तुरन्त ही बक दिया कि मैने ही कहा था कि आपके पास किताबें हैं। वह हँसने लगे फिर समझाते हुए बोले देखो ये विज्ञान की पुस्तक है और ये भूगोल की और ये मोटी पुस्तक प्राणिशास्त्र की है। उन दिनों मैं बोलने में माहिर था। तुरन्त पूछा कि ये क्या है। मैने अंग्रेजी भाषा मे लिखे अक्षर की तरफ इशारा किया था। शायद उस दिन उन्हें हम लोगों को अंग्रेजी सिखाने की प्रेरणा मिली थी। क्योंकि तब के ज़माने में कक्षा छः से अंग्रेजी पढ़ाना शुरू होता था। अगले दिन से हम लोग ए बी सी डी पढ़ना शुरू कर दिय्रे। उनके पढ़ाने के तरीके बिल्कुल अलग थे वे रटाते बिल्कुल न थे। वे समझाते थे हर एक चीज …। हम लोग जोड़ घटाना अक्सर गलत कर देते तो वे हम लोगों को मारने के बजाय कुछ और तरीके बताते। जैसे मिट्टी की गोली बना कर जोड़ना, खड़ी पाई खींच कर जोड़ना, उंगली पर जोड़ घटाना करना। उस छोटी उम्र में वे वैदिक गणित की तकनीकें हमें समझाते। हम लोग उस समय के अव्वल छात्र थे। एक दिन पण्डित जी के एक दोस्त ने हम लोगों को 1 से 20 तक पहाड़ा लिखने को दिया और हम लोगों ने झटपट लिखकर दिखा दिया लेकिन वे अभिमानी टाइप के थे तुरन्त ही पूछना शुरू किया वो भी 13, 15, 17, 18, 19 के पहाड़े जो कि मुझे याद ही नही रहते। तुरन्त उन्होंने टिप्पणी की कि हमारे गाँव का फलाने का लड़का तुरन्त बता देता है। इन सबके बावजूद उनके जाने पर पण्डित जी ने कहा – बुरा मत मानना वह संकीर्ण दिमाग का था। उनकी इस बात मे प्रोत्साहन छिपा था। एक साल बाद पापा नानी के यहाँ आये और हमें शहर वाले घर (जो बनकर तैयार हो चुका था) ले जाने लगे। रोने का एक सिलसिला चल पड़ा था। दीदी नानी से लिपट कर रो रही थी कि कहीं नही जाना है और मैं रोते हुए सबसे उंचे आम के पेड़ पर चढ़ गया था कि मैं नही जाउँगा। अंततः वह घड़ी आ गयी थी जब हम अपने खेलने कूदने वाले समय को विदा कहना पड़ा और उस सपनों के घर को छोड़ कर चिल्लपों करते शहर वाले घर में आना पड़ा। पण्डित जी उस समय अपने घर गये हुए थे आते समय उनके पैर भी न छू पाये थे हमलोग। समय बीतता गया। शहर वाले घर के पास एक स्कूल में हम लोग पढ़ने लगे। यहाँ ज्यादातर शिक्षक ग्रामीण ही थे और ज्यादा पढ़े लिखे नही थे। हम लोगों के अन्दर विशेष योग्यता को देखते हुए कक्षा 3 और 4 न पढ़ाकर सीधे पाँच मे भेज दिया गया। कुछ साल बाद नानी के यहाँ जाने का मौका तो मिला लेकिन वहाँ पण्डित जी न मिले। सुना कि वे रिटायर हो गये और बच्चों के घर चले गये। लेकिन अपनी सारी किताबें हम लोगों के लिये रख गये। उस दिन आँखें उसके लिये डूब गयी थी जिससे डर लगता था। शायद समय ने करवट बदल ली थी। कुछ दिन बाद ही मुझे बहुत तेज बुखार पकड़ लिया। जिससे मेरा शरीर पूरी तरह टूट गया और मेरी आवाज लड़खड़ाने लगी कुछ दिन तो मैं बोल ही न सका था। बुखार से निकलने के पश्चात मैं एक हकलाने वाला लड़का बन गया। यही एक बात मेरे दिल और दिमाग पर ऐसी छाई कि पढ़ाई पर से नियंत्रण छूट गया। फिर तो फेल पास होते होते यहाँ तक पहुँच आया। तब से आज तक जलालत भरे शब्द सुनते चले आ रहे हैं खुद के लिये… ऐसे मे कोई प्रोत्साहन नही मिला। बस पण्डित जी की याद आती है और उनके वो प्रोत्साहन भरे शब्द …… आज स्थिति यह है कि उत्तीर्ण होने के लिये भी मशक्कत करनी पड़ती है। स्वास्थ्य का कोई भरोसा नही कब बिफर जाय। सच कहा जाय तो मन ही नही लगता। लेकिन इसी बीच सिन्हा सर के शब्दों ने कुछ आशा जगाई है। आज से एक नयी शुरुआत करने की तमन्ना है। सोच रहा हूँ कि अपनी इस बात को सिन्हा सर तक पहुँचाया जाय। ताकि जब भी उन्हें समय मिले वे ऐसी बाते बतायें जिससे हम सब कुछ सीख सकें। साथ में उन्हें भी इस बात का भी आभास हो कि उनकी बातें जाया नहीं हो रही हैं हम उन्हें बारीकी से सुन रहे हैं और अपना भी रहे हैं।
लेकिन इस बात का डर भी है कि कहीं डाँट न पड़ जाये और इस बात का भी कि क्लास में खड़ा करके अपने विषय के कुछ प्रश्न न पूछ बैठे। न बता पाने पर डांटना शुरू कर दे कि फालतू लिखते हो पढ़ा लिखा भी करो। वैसे भी अभी तक मुझे कुछ आता जाता नही। कहीं ऐसा न हो जाय कि इंट्रो के खिलाफ मेरे लेख (जूनियर बनाम सीनियर) से भड़के मेरे साथी फिर से न उखड़ जाय कि अब टीचर के उपर लिखता है। लेकिन इन सब के बावजूद इस विश्व पटल पर अपने इन शब्दों को रखने से भला कौन रोक सकता है? - मनीष August 22 कुत्ते भी इन्सानियत अपनाने लगे हैं
कुत्तों में भी इन्सानी गुण आने लगे हैं
जाते थे पहले पतिदेव साथ बाज़ार लेकिन अब कुत्ते साथ जाने लगे हैं
नौकर मन ही मन देता है साहब को गालियॉ देखा है, कुत्ते भी मालिक को गुर्राने लगे हैं
करते हैं प्यार भरी बातें झाड़ियों के पीछे, प्रेमीयुगल कुत्ते तो खुलेआम इश्क लड़ाने लगे हैं
प्यार में होती है मारपीट प्रेमियों के बीच कुतिया को लेकर, कुत्ते भी एक दूसरे को काट खाने लगे हैं
युवतियों को देख लार टपकाते देखा है बूढ़ों को बुजुर्ग कुत्ते भी, जवान कुतियों पर नज़र गड़ाने लगे हैं
इन हरकतों को देख लगता है जैसे कुत्ते भी इन्सानियत अपनाने लगे हैं
- मनीष August 17 आखिरी पड़ाव सिन्दूरी शाम, मन्द गति से चलती हवाएँ और डूबता हुआ सूरज। इन सबसे बेखबर गाड़ियाँ नैनी ब्रिज पर दौड़ रही है और कुछ लोग चहलकदमी कर रहे हैं। कुछ लोग उफान ले रही यमुना नदी को निहार रहे हैं और कुछ थूकने के बाद थूक के प्रक्षेपण मार्ग का अवलोकन कर रहे हैं। विचरण हेतु आये सभी लोग अपने में मस्त हैं। इन्ही के बीच एक किनारे खड़ी बीस वर्षीय युवती अपने अतीत को निहार रही थी। अतीत, जिसमें वह खिलखिलाई, हँसी, मुस्कुराई और गमज़दा हुई। अतीत, जिसमें एक प्यार छिपा था माँ का, बाप का, भाई बहन का। अतीत, जिसमें लड़कपन था, अल्हडपन था और थोड़ी सी शरारत। अतीत, जिसमें उल्लास था कुछ कर गुजरने का जज्बा था। अतीत, जिसमें एक प्यार का फूल खिला था। अतीत, जिसमें फरेब था, धोखा था, छलावा था, दर्द था, दुख था। और वह अतीत, जिसमें हार थी, बेचैनी थी, घुटन थी।
सारे अतीत के पन्ने एक एक कर उसके सामने खुल रहे थे। कितनी ख्वाहिशें थी मन में लेकिन … । एक आँसू की पतली धार उसके आँखों से बह चली। लेकिन उस वक़्त इस आँसू को कोई पोछने वाला वहाँ कोई नही था और आँसुओं की यह धार लम्बी खिंचती चली गयी।
चार साल पहले ही तो वह बुन्देलखण्ड से इलाहाबाद आई थी पिता की होनहार बेटी बनकर। इलाहाबाद यूनिर्वसिटी से ग्रेजुएशन किया था और 75% अंक बटोरे थे वह भी B.Sc.(Maths) से। लेकिन सब व्यर्थ ही जायेगा शायद। कितनी खुशी से उसने M.Sc.(Maths) में प्रवेश लिया था, इस बात से बेखबर कि यह रास्ता उसके जीवन डगर को छीन लेगा। प्रवेश की खुशी अभी कम भी न हो पायी थी कि फ्रेशर पार्टी में उसे मिस फ्रेशर चुन लिया गया। इतनी खुशी एक साथ मिल जाने के कारण वह कुछ सोच समझ भी न पाई थी कि मतलबी लोगों के जाल में फँस गयी और यह जाल उसे नैनी ब्रिज पर ला खड़ा किया।
अपने अतीत की यादों में सिसकते हुए उसने एक दोस्त को फोन किया लेकिन उस दोस्त ने फोन रिसीव नही किया, दूसरे को किया लेकिन कोई उत्तर नही मिला, फिर तीसरे को, फिर चौथे को फिर……फिर और फिर। लेकिन उसके दोस्तों को अब उसकी कोई ज़रूरत नही रह गयी थी।
वह झुंझलाहट के मारे चीख पड़ी। कई दिन के तनाव ने उसके सोच समझ को जकड़ रखा था नतीजन वह नदी में छलांग लगाने को उतावली हो गयी और बिना कुछ विचार किये नैनी ब्रिज से यमुना नदी में कूद पड़ी।
शरीर का भार जो अब शून्य था, हवा का बहाव जो नदी के पानी तक पहुँचने से उसे रोक रहा था। इन सब चीजों ने शायद उसकी चेतना लौटा दी थी लेकिन तब तक देर हो गयी थी। एक जोरदार छपाके की आवाज़ के साथ वह यमुना नदी की गहराई मे दाखिल हो गयी। मटमैले पानी के स्वाद से उसका मुँह भर गया। पानी की एक तेज़ धार उसके आँसुओं को धुलती हुई अन्दर तेजी से बढ़ी। इसने उसे रोकना चाहा लेकिन मुँह अनायास ही खुल गया और पानी की वह धार गले से नीचे उतर गयी। उस समय वह पानी से बाहर आने के लिये बुरी तरह छटपटा रही थी। हाथ पैर तेजी से हिल रहे थे लेकिन सब व्यर्थ। आँखे मिट्टी से भर गयी और एक भयानक अंधेरा उसके सामने तैर गया। उसे सहायता की ज़रूरत थी लेकिन सहायता इस तेज बहाव के कारण काफी पीछे छूट गयी। उसका दम घुटने लगा और जीवन के सारे दृश्य अचानक ही उससे होकर निकल गये और दिल ने धड़कना बन्द कर दिया। वह निढाल सी होकर तलहटी में घिसटने लगी। घिसटते-घिसटते वह बहुत दूर निकल गयी। इतनी दूर कि कोई अपना उसे ढूँढ न पाये।
नैनी ब्रिज से कई खुले मुँह और फटी आँखे उसे पानी में तलाश रही थी।
कितनी अजीब बात है जब वह इलाहाबाद आई थी तो नैनी ब्रिज निर्माणाधीन था। शायद उसके जीवन का आखिरी पड़ाव यही था।
या फिर वह अभी भी सफर कर रही होगी नदी की तलहटी में घिसटते हुए……
उसके सड़ चुके बदन को कई कीड़े चाट रहे होंगे और वह किसी जंगल में नदी के किनारे लग गयी होगी। उसका सुन्दर शरीर जानवर खा रहे होंगे।
शायद आखिरी पड़ाव से गुजरना अभी बाकी है।
नोट – अभी कुछ दिन पहले घटी इस घटना ने मन को व्यथित कर दिया। मैनें अपने जीवन का सातवाँ सहपाठी खोया है। इलाहाबाद यूनिर्वसिटी से B.Sc.(Maths) करते समय भी मैने एक दोस्त को खो दिया था। नाना पाटेकर की आवाज में रिंगटोनआजकल युवाओं में तरह तरह के रिंगटोन बजाने की होड़ सी मची है। पान की दुकान के पास कोई रिंगटोन बजा रहा है तो कोई सिंगटोन … और कुछ शाही लोग तो काफ़ी कुछ देख सुन लेते हैं। लेकिन ऐसे क्लिप्स मिल जाये तो फिर क्या बात … आप भी सुनिये …और खामोश चेहरे पर मुस्कान ले आइये :) ज़रा इस पर भी कान लगाईये… कैसा लगा??? August 16 नाना पाटेकर की आवाज में रिंगटोन
आजकल युवाओं में तरह तरह के रिंगटोन बजाने की होड़ सी मची है। पान की दुकान के पास कोई रिंगटोन बजा रहा है तो कोई सिंगटोन … और कुछ शाही लोग तो काफ़ी कुछ देख सुन लेते हैं। लेकिन ऐसे क्लिप्स मिल जाये तो फिर क्या बात … आप भी सुनिये …और खामोश चेहरे पर मुस्कान ले आइये :) ज़रा इस पर भी कान लगाईये… कैसा लगा??? …ए बेटी रखती तोहके कुँवारभोजपुरी गाने अकसर फूहड़ ही होते हैं, लेकिन इसे देख मेरी सोच बदल गयी। कुछ तो ऐसे हैं जो आँसू निकाल देते हैं। |
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