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10月21日 भीड़ में अपना चेहरा दिखाना चाहते हो तो पुकारो अश्लील, अश्लील!!!
हाँ जी! अभी कुछ दिन पहले अमेरिका में इस मुद्दे पर शोध हुआ जिसके नतीजे चौकने वाले रहे। अगर आप भीड़ में उपेक्षित हैं तो बस चिल्ला भर दीजिये – अश्लील, अश्लील……, मेरे घर में अश्लील, मुहल्ले में अश्लील, पड़ोस में अश्लील, ब्लाग में अश्लील, पूरी दुनिया में अश्लील……… तुरन्त ही आप महसूस करेंगे कि भीड़ आप की ओर मुड़ जायेगी। लेकिन शर्त यह है कि अश्लील कायदे का हो। यहाँ हम अपने स्तर से नीचे जाने में सकुचा रहे हैं इसलिये ‘अश्लील’ को अश्लील कह रहे हैं। दरअसल ‘अश्लील’ शब्द, उन शब्दों और वाकयों का निचोड़ है जो कि समाज में खुले आम प्रतिबन्धित हैं। चोरी छिपे या अनुसाशन से करो तो वही शब्द और घटनायें शील हैं, मधुर हैं। तो अश्लील माने क्या होता है? सब जानते हैं, यहाँ परिभाषा बनाने हम नही बैठे हैं। हम तो शोध पत्र जारी करने बैठे है जो सीधे अमेरिका से फैक्स के माध्यम से हमारे पास आया। शोध पत्र की भाषा कठिन है। इसलिये शार्ट में समझाते हैं, जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हम सभी सुंदर वन के प्राणी है। प्राणी हैं इसलिये चीखते भी हैं चिल्लाते भी हैं, मौका मिले तो गाली भी देते हैं। सुंदर वन की खास बात है कि जो कहना है कह भर दो, कोई नियम कानून नही है। इसी कहने के चक्कर में मार हो जाती है, सिर फोड़ौउअल का खेल चल पड़ता है, दूसरी तरफ शांति की बात होती है, मन की शांति, तन की शांति… जब सारी बातें हो जाती हैं तो दिमाग सोचता है कि अब नया क्या? हमने शील की बात कर ली, काफी अच्छे अच्छे लेख लिख डाले, कविता, गज़ल, कहानी सब तो ठूँस दिया सुंदर वन में अब क्या करें? अब तो हालत यह हो गयी है कि कोई पूछता भी नहीं। बस यही से हमारी असली मानवता नज़र आने लगती है, हम उस मुद्दे की तरफ जाते हैं जो समाज मे रहकर देखना भी पसन्द नही करते, परन्तु अकेले देखने को मिल जाय तो क्या कहने…… अरे भाई वही……!! अश्लीलता… भिन्न प्रकार की अश्लीलता… उम्र बीत गयी लेकिन ऐसे शब्द लिखे हुए हमने नही देखे केवल सुने थे लेकिन सुंदर वन की महिमा के चलते उसे लिखा हुआ भी देख लिये…और लिखने वाले कौन? उम्र में हमसे चार गुना बड़े भाई साहब!! और लिखने का कारण? उनको भीड़ चाहिये। भीड़ जुटाने के चक्कर में वो हमें अश्लील शब्द पढ़वाते है कि देखो उसने ऐसा कहा और अपने को साफ जताते हुए वो उस अश्लील को जी भर गालियाँ दे डालते हैं कि समाज में खुले आम अश्लील काम करते हो और भीड़ उनके इस प्रयास की कोटि कोटि प्रशंसा करती है, आखिर भीड़ को भी तो भीड़ चाहिये। भीड़ तो मानव भावनाओं से महिमा मंडित है जहाँ अश्लील और सेक्स की बात होती है उधर अपने आप मुड़ जाती है। इसका भी एक कारण है, सेक्स और अश्लीलता विषय ही ऐसा है कि देख लिया, सुन लिया तो मन में गुदगुदी सी होने लगती है। यह तो मानव की प्रमुख कमजोरी है। इस कमजोरी को एक विशेष मनोवैज्ञानिक तरीके से अपनाते हुए भीड़ को अपने काबू में किया जा सकता है। खुदा न करे कि ऐसा दिन आये जब सुंदर वन के प्राणी जो कि जल्द ही दाखिला लिये हैं वे भी गलियों चौराहों और ऐसी जगहों पर जाये जहाँ अश्लील दिखता है, अश्लील बिकता है और वही से हमारे लिये भी ढेर सारी अश्लीलता बटोर लाये और बोलें – लीजिये सर! आपके लिये फ्री गिफ्ट है। कितने अच्छे विचार से इस सुंदर वन का निर्माण हुआ होगा कि सब पढ़े, सब बढ़े। लेकिन आज जो आगे बढ़ रहा है उनकी टाँग पकड़ कर सब लटक गये हैं। न खाइब न खाये देब! इस समय हम अपनी पसन्द के फल सुंदर वन से चुन चुन कर खा रहे हैं। खाते समय गन्दगी का जिक्र नही करते लेकिन गन्दगी का अस्तित्व तो होता ही है, सब जानते हैं। आखिर, खाते समय गन्दगी की बात छेड़कर आप क्या साबित करना चाहते हैं, कि फलां जगह इस टाइप की गन्दगी है!!? लेकिन आजकल की साइकॉलॉजी समझ पाना कठिन हैं। लेकिन हमने कोशिश की और अमेरिका वालों ने भी की, इस साइकॉलॉजी को समझने की !! सीधी साधी साइकॉलॉजी है कि सुंदर वन की साइकॉलॉजी दूषित हो रही है। सभी साइकॉलॉजी के पीछे एक साइकॉलॉजी है और उसके पीछे दूसरी। इसे इस तरह से समझा जा सकता है – 1) जैसे एक प्राणी ने कुछ अश्लील शब्द आपको समर्पित किये और बोले कि ये अश्लील है, इसे रोका जाना चहिये। इसमें भीड़ जुटाने की साइकॉलॉजी है और ये दिखने की कि हम साफ पाक हैं। 2) दूसरी साइकॉलॉजी यह है कि वह ढेर सारी वाह वाही पायेगा कि क्या बात है, गन्दगी विचारणीय है और साथ ही वह इन्तजार करता है कि कोई आगे आये और मुझे डाँटे कि अश्लील शब्द क्यों लिखे हो। 3) अगर कोई ऐसा नही करता तो वह खुद पर खुद एक अनजान शख्स बनकर एक टिप्पणी करता है और अपने आप को खूब कोसता है – “आपको खुद ऐसा नही लिखना चाहिये।“ 4) इसमें यह साइकॉलॉजी है कि और लोग आये और टिप्पणियों से डाँटे ताकि प्राणी पापुलर हो जाये जिससे प्राणी के बारे में भी लोग लिखें कि कितना बेहूदा है। 5) अच्छे बनकर भीड़ में खो गये इससे अच्छा है कि ऐसे ही दिख कर लोगों के सामने बने रहे, बाद में सफाई भी दे देंगे। 6) भीड़ को भूलने की आदत है, कुछ दिन में भूल जायेगी। प्राणी अब भक्तिमय रचनाये लिखेगा और अनन्य भक्त के रूप में स्थापित हो जायेगा। 7) अगर इसके बवजूद भीड़ नहीं आयी तो पापुलर लोगों पर गालियों की बौछार करता है और उनकी टाँग पकड़कर खींचता है कि उसी के बहाने हम सामने तो रहे। बाल की खाल निकालने से भी नही चूकता। 8) और भी ढेर सारी मलिन साइकॉलॉजी………… तो बाबूजी हमने देख लिया सुंदर वन की गरिमा। ये भी माया का एक जाल है। इस मायाजाल से हम बहुत दूर थे तथा किसी और वन में मस्त होकर जीवन यापन कर रहे थे। एक दिन बड़े भाई साहब ने सुंदर वन की महिमा बताई और हम चले आये………… अब जब आ ही गये हैं तो मेरी साइकॉलॉजी ने भी पलटी मारी होगी। मैने भी यह अश्लील पुराण एक दूषित साइकॉलॉजी के चलते लिखा है…………… इसमें कोई शक नही है। पहले तो सोचते थे कि कितना हसीन सुंदर वन है तरह तरह के फल हैं लेकिन मुझे क्या पता था कि सारे फल बिकते भी हैं। अब जब फल मंडी खोल ही ली है तो शोरगुल तो होगा ही, ग्राहक पकड़ने के लिये। लेकिन कुछ ऐसे भी है जो फल दान करने आते हैं। इसकी मुझे खुशी है। 引用通告此日志的引用通告 URL 是: http://manish2god.spaces.live.com/blog/cns!E262EDF52352134C!302.trak 引用此项的网络日志
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