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    October 18

    मैडम जी चोट नही लगी …

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        मेरे घर के ठीक बगल में स्थित स्कूल की खिड़की खुली थी। जहाँ से शोर का शोरबा रिस कर मेरे कानों तक पहुँच रहा था। मैं बच्चों की अटखेलियाँ देखने अपने छत पर आ पहुँचा। छत से खिड़की काफी करीब थी। नजदीक जा कर देखा, कक्षा सात या आठ के विद्यार्थी अपनी कक्षा में मदमस्त होकर उछ्ल कूद कर रहे थे, कुछ झगड़ रहे थे और कुछ बाकायदा हाथ घुमा घुमा कर बोल बतिया रहे थे।

       

          अचानक ही उनके इस कार्य को ग्रहण लग गया और चहु ओर शान्ति स्थापित हो गयी। शायद कोई अध्यापक आ रहा था। मैं वापस लौटा कि कौन भयावह टीचरों का चेहरा देखे, उम्र भर तो देख देख कर पिटते और सुबकते रहे हैं और वैसे भी मास्साब शब्द सुनते ही दिल बैठने लगता है, दिमाग में प्रतिकृति उभर आती है एक मोटे मानव की जिसकी रावण जैसी आवाज़ थी और हँसी तो ऐसी मानो हमें ही डांट रहा है। अध्यापकों से डर का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब कभी मास्साब बाजार में दिख जाते तो हम भीड़ में छिप जाते कि कहीं देख न ले और अगर गाँव की पगडण्डियों पर दूर से ही आते दिख जाते तो हम रास्ते से खेतों में उतर कर पैंट की जिप खोल लेते और पेशाब करने का नाटक करते। उनके करीब आते आते तो पेशाब हो ही जाती, या फिर इस डर से हो जाती कि अभी खड़े देख लेगा तो कल बुरी हालत बनायेगा। उनके गुजर जाने (रास्ते से) के बाद हम वापस रास्ते पर आते और बिना पीछे मुड़े, सरपट घर की तरफ भागते।

     

     

          बच्चे खड़े होकर अभिवादन किये – “गुड मार्निंग मैडम”। मैडम शब्द सुनकर पाँव ठिठके। हमारे अन्दर पल भर के लिये समाये डर का वजूद नही रहा और शान से वापस पलटे। पलटते ही मैडम जी के उपर निगाह पड़ी, जिस तेजी और शान से वापस मुड़े थे उसी तेजी से मुझे फिर से वापस मुड़ जाना पड़ा। चाल में तेजी लाते हुए हम छत के उस छोर पर चले गये जहाँ से खिड़की नहीं दिखती।

     

     

       दरअसल बात ये हुई कि ये जो बच्चों की मैडम थी ये कक्षा दो से पाँच तक की मेरी सहपाठिनी थीं। जाहिर है उस समय की हुई कुछ हरकतों से इस उमर में शरम तो होगी ही। कैसी कैसी बचकानी हरकतें होती थीं उस दौरान, याद आते ही चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती है। उस दौर के हम आंशिक प्रतिद्वंद्वी थे वो सभी विषयों की माहिर थी और हम निठल्ले केवल गणित के…………, जब कभी वो गणित में मुझसे ज्यादा अंक पाती तो जीभ निकालकर, अंगूठा दिखाकर मेरा अभिवादन करती और जब मेरी बारी आती तो मैं अपना मुँह खोलकर उसे अपने सारे दाँत दिखा देता। जो कुल मिलाकर तेरह थे, बाकी खेलकूद, लड़ाई झगड़े, साइकिल से गिरकर तोड़ लिये थे। जिसमे से एक सामने वाला दाँत चाकलेट ठूँसने से खराब हो गया था। गलती से अगर वह उसे दिख जाता तो वह मुझे चिढ़ा चिढ़ा कर मेरा कान खा जाती। जिस दिन उस दाँत के टूटने का समय आया मैं प्रफुल्लित हो गया कि अब मेरा खराब वाला दाँत टूट जायेगा लेकिन मुसीबत जल्दी नहीं जाती। दो हफ़्ते तक वह दाँत डुगुर डुगुर हिलता रहा लेकिन कम्बख्त टूटता ही नही था। अगले दिन इन मैडम के द्वारा किये गये उपहास से हम क्रोध में आये और सिल बट्टे का बट्टा उठाया और अपने हिलते दाँत पर दे मारा। वह दाँत तो टूट गया लेकिन बगल वाला दर्द के साथ हिलने लगा लेकिन उस दाँत के जाने की खुशी के सामने दर्द छोटा लगने लगा था।

     

     

        बट्टे को मुँह पर मारते हुए बड़ी दीदी ने देख लिया था और स्कूल जाकर सबको बता दिया। यहाँ तक कि उस मुसटंडे मास्साब को भी……। अपनी कक्षा में मास्साब ने मुझे खड़ा कराया और मजे लेकर पूछे – “क्या बेटा !, दाँत तोड़ने के लिये कोई और औजार नही मिला क्या?” फिर तो जग हँसाई हुई कि रामचन्द्र का बेटा बट्टे से दाँत तोड़ता है।

     

     

         इन मैडम जी की लाटरी निकल पड़ी थी जब मौका मिले अपने दाँतों पर कलम ठोंककर चिढ़ा देती। उसके दाँत मोतियों जैसे थे सो दाँतों को लेकर मैं उसे चिढ़ा भी नही पाता लेकिन वह अपनी आदत से बाज़ नही आई जब तक कि पूरी तरह से दाँत निकल नहीं आया।

     

       लेकिन अब वो दिन लद गये। आज पूरे 30 चमचमाते दाँतों का मालिक हूँ बाकी के दो पेंडिंग में हैं।

     

        एक दिन वह अपनी दीदी के साथ मेरे घर आयी। मेरी और उसकी दीदी सहेलियाँ थीं। मेरे पास ताबें के पुराने सिक्कों का अच्छा खासा संग्रह था। जो मेरे लिये प्राणप्रिय था। उस समय मैं उन सिक्कों के साथ खेल रहा था। उसने सिक्कों पर अपनी नज़रें गड़ा दी थीं। उसे ऐसे देखता देख मैनें सिक्कों को समेटा और बाहर निकल गया।

     

       दूसरे दिन कक्षा में दो ताँबे के सिक्के दिखाकर वह मुझे चिढ़ाने लगी। मुझे लगा कि मेरा सिक्का उसने ले लिया है। मैं क्रोधित हो गया। उस समय मास्साब कुछ पढ़ा रहे थे, मैने आव न देखा ताव, झपट पड़ा। उसके बाल खींचकर दो झापड़ लगाये और धक्के देते हुए सिक्के छीन लिये। वह ज़मीन पर गिर पड़ी थी। अचानक हुए इस घटनाक्रम से मास्साब क्रोधित हो गये और मुझ पर डंडे की बारिश करने लगे। कितनी बार उन्होनें सिक्का वापस करने को कहा लेकिन प्रिय चीजें आसानी से नहीं दी जातीं और न ही मैनें वापस किये। मास्साब ने इस ढिठाई के लिये पिताजी से शिकायत करने की चेतावनी दी लेकिन कुछ असर नही हुआ। मास्साब ने उसे समझा बुझा कर चुप करा दिया।

     

        सिक्के लेकर मैं घर आया और डिब्बे खोलकर अपने सिक्के गिनने लगे। परन्तु यह क्या मेरे सिक्के तो पूरे हैं फिर ये किसके हैं हूबहू मेरे सिक्को जैसे!! मैं सोच में पड़ गया। इतने में स्कूल से लौटीं दीदी ने आकर एक चपत लगाई और बोलीं – घर आये सहपाठी के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं जैसा तुमने उस दिन किया??? और तो और दूसरे का सिक्का छींनकर शेर बनते हो? वे सिक्के मैनें दिये थे उसे……। दीदी की आवाज तेज थी, आगबबूला होतीं दीदी उसके घर चली गयी। मैं अपराधियों की तरह सिक्कों के बीच पड़ा रहा।

     

     

       दूसरे दिन मैनें अपना सिक्कों से भरा डिब्बा उठाया और उसमें दोनों सिक्के डाल कर स्कूल चला गया। स्कूल आकर मै अपने यथा स्थान पर बैठ गया और उस तरफ देखा जिधर वह बैठती थी। लेकिन आज उसकी सीट खाली थी क्योंकि आज वह सबसे पीछे वाली सीट पर बैठी थी। मैं उस समय अपने आप से घृणा कर रहा था। उसके चिढ़ाने से मुझे लगता थ कि मैं कक्षा में हूँ लेकिन आज मैं कुछ अलग थलग पड़ा महसूस कर रहा था।

     

         भोजन अवकाश के समय सारे बच्चे अपना टिफिन खा कर बाहर खेलने चले गये और वह वही कोने में बैठी रही। मैं सिक्कों का डिब्बा लेकर सीधा उसके पास पहुँचा और उसके हाथों मे रख दिया। वह सरक कर एक कोने चली गयी और मुँह फेर लिया। उसने अभी अपना खाना खाया नहीं था। मैं उसकी टिफिन निकालकर खाने लगा। मेरे मुँह से चपर चपर की आवाज सुनते ही उसने नजर घुमाई और मुझे अपना टिफिन खाता देख वह लाल पीली होती मेरा टिफिन उठा लायी और खुद खाने लगी और उसकी जीभ बाहर निकली और अंगूठा उसकी खड़ी मुट्ठी पर नाच उठा। उसके यूँ चिढ़ाने से मुझे अपार खुशी हुई।

     

        छुट्टी के समय उसने सिक्कों का डिब्बा लौटाना चाहा लेकिन मैं उस डिब्बे को पहचानने से इन्कार कर दिया। जवाब में उसने कहा – अच्छा ठीक है, अपना हाथ तो दिखाओ…… कल ज्यादा चोट लगी थी ना !!! मास्साब काफी तेज तेज मार रहे थे … वो अच्छे नही हैं। इतना कहकर वह मेरा हाथ उलटने पलटने लगी। उसके इस व्यवहार ने मेरी आँखों मे पानी ला दिये। मानो मास्साब के डंडे की चोट से हुआ दर्द आज महसूस हो रहा है, और आँखें आँसू के रूप में उस दर्द को पिघला रही हैं। मैं कुछ न कह सका, बस उसके उन गालों को, जिस पर मैने थप्पड़ लगाया था, धीरे से सहलाकर रोता हुआ घर की तरफ दौड़ पड़ा।

      

        उस दिन मैनें भावों की अनुभूति की थी, साथ ही यह जाना था कि प्रेम अंतःस्थल में रहता है जिसे देखा नही जा सकता और यह भी जाना कि सिक्कों की भाँति स्नेह को गिना नही जा सकता। वास्तव में मैने असली सिक्के पा लिये थे। जिसे न कोई छीन सकता है न ही कोई चुरा सकता है।

    और दूसरे दिन से ही उसने अपना मोर्चा सँभाल लिया……………

     

    मुझे कभी कभी मास्साब भी चिढ़ाते – “क्या रे सिक्काचोर, गृहकार्य करके आया है?”

     

    कक्षा पाँच के बाद वह कहीं चली गयी। शायद उसके पिता जी का स्थानांतरण हो गया था।

     

    उन दिनों के बाद अचानक ऐसे दिख जाने से पहले पहल तो झेंप जाना स्वाभाविक है। मैं कुछ सोच कर वापस स्कूल की खिड़की तक पहुँचा। मैनें छिपकर, चोर निगाहों से उसे देखा। वह काफी खूबसूरत हो गयी है लेकिन बचपन में कुछ ज्यादा ही थी, दूध जैसे तो गाल ही थे और काजल से घिरी वो बड़ी आँखें ……। चेहरे में खास परिवर्तन नहीं आया। अभी विश्लेषण कर रहा था कि ………

     

    एक विचार उठा कि क्या मैं उसके सामने जाकर बीती बातें दोहराऊँ? क्या वे बातें उसके मन में आज भी उतनी ताजी होंगी? शायद गुजरते समय के साथ वह सब भूल गयी होगी और पहचानने से इन्कार कर दे………

     

    हो सकता है कि वो मुझे पहचाने और फीकी हँसी हँसे और पूछे – कैसे हो, कहाँ हो, क्या कर रहे हो? मैं उसे प्रश्नों के ज़वाब भर देता रहूँ …………

    मैं उसकी उन भोली यादों के साथ छेड़खानी बिल्कुल नही चाहता था। जैसा है वैसा रहने दिया जाय अब और कोई परिवर्तन नही।

    उससे मिलने की बात छोड़कर उसके क्रियाकलाप देखने लगा। वह हाथ में किताब लिये गणित पढ़ा रही थी ……… कुछ प्रश्न श्यामपट्ट पर लिख कर वह कुर्सी पर बैठ गयी।

    कि अचानक

    वह तुनक कर उठी और एक बच्चे को डांटते हुए बाहर बुलाया और कुछ पूछताछ करके छड़ी उठाई और उसके हाथों पर दो छड़ी लगाते हुए बोली जाओ बैठो लेकिन अब शरारत मत करना।

    वह बच्चा हँसने लगा। वह फ़िर गुस्साई और तेज आवाज में पूछी – क्यों हँस रहे हो? बच्चा बोला - मैडम जी चोट नही लगी ……

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