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10月16日 चाँद के पार चलोखुला आसमान, जिस पर कुछ धूमिल तारे अपनी टिमटिमाहट से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, क्योंकि आज चाँद अपना पूरा लिबास पहन कर आया है और ये आकाश से गिरती अदृश्य ओस की बूँदें मुझे चेता रही हैं कि कुछ ओढ़ लो वरना सुबह तक ओढ़ लोगे। रजाई में लिपटे छींकोगे और गला फाड़ कर खांसोगे। आज कुछ ज्यादा ही धार्मिक स्थलों की सैर हो गयी। सुबह उठते ही भैरव बाबा, जो कि घर से 40 किमी दूर हैं, के दर्शन को चले गये थे उधर ही गुरु बाबा की पुण्यस्थली भी थी वहाँ भी चले गये। लौटते समय दीदी की ससुराल तक चले गये। नतीजन शाम तक हालत पंचर हो गयी थी। आज पूर्णिमा की मन भावन रात है और बाल्मीकि जी का हैप्पी बर्थडे भी है। मन में विचार आया कि सभी पुण्यात्मायें पूर्णिमा के दिन ही धरती पर अवतरित हुई है और एक हम पाप के सौदागर ठहरे जो सात दिन पहले ही टपक पड़े। पूनम की हसीन रात मधुर चाँदनी बिखेर रही थी। इस चाँदनी के चक्कर में मैं अपना बिस्तर छत पर उठा लाया था। चूँकि अभी तक अपने घर (आज़मगढ़) रहकर आराम फरमा रहा हूँ तो लाज़मी है कि बड़े मेरे इस हसीन विचार में अपनी टांग अड़ाये। नीचे से पिता जी की क्रूर आवाज आयी। जिसमें यह सन्देश था कि नीचे आकर निद्रा का आनंद उठाओ वरना वे उपर आकर मेरे आनंद में बाधा पहुँचायेंगे। पिता श्री की बातों से प्रेरित होकर माता जी ने भी आवाज लगाई – उपर हंडा गाड़े हो का? लेकिन आजकल पटाना हर किसी को आता है केवल मुझे छोड़कर। इस बात का पता मुझे आज ही चला हांलाकि शक पहले से ही था। जब मैनें अपने माता-पिता को समझाना चाहा तो वे और उखड़ गये। “चाँदनी लुत्फ़” के लिये विह्वल मन मुझे छोटे भाई तक खींच ले गया। मैने उसे अपनी इच्छा बताई तो उसने मेरे लिये माता पिता से बात की और आश्चर्य की बात ये रही कि माँ बाप मान गये लेकिन इस बात का तनिक भी आश्चर्य नही रहा कि छोटे ने कैसी-कैसी मन लुभावन बात माता पिता से कही। उसका ये पैदाइशी गुण है। नीचे वाली सदन में उपर आने का प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद मैनें आसन (बिस्तर) ग्रहण किया और उपर आसमान में लटक रहे चाँद पर अपनी आँखे गड़ा दी। ग्रामीण इलाका होने के कारण काफी शन्ति थी। पेड़ पर बैठे झींगुर अपना राग अलाप रहे थे, कुछ सियार और कुत्ते आपस में गाली गलौज किये जा रहे थे। सामने ही पुराना पीपल का पेड़ था, मेरे घर वालों का मानना था कि उस पर कुछ आत्मायें हैं जो रात में विचरण करती हैं। एक नज़र उसे भी देखा। डर पहले से हो तो ऐश्वर्य राय भी डरावनी दिखेगीं। किसी भूतनी की तरह्। राय साहब जो कि अब बच्चन साहब के मत्थे जड़ दी गयी हैं उनका ध्यान आते ही मुझे अपनी राय साहब याद आ गयी। हाय! क्या सूरत थी… और सीरत तो मुफ्त में मिली थी। कम्बख्त ! अगर पटाना सीख लिया होता तो कम से कम ये वेदना तो न होती। कितनी बार हरे सिगनल मिले परन्तु … पागल प्रेमी पूर्णतया वर्णान्धता के शिकार होते हैं, हरे और लाल में खास फर्क़ नही दिखता सो मुझे भी नही दिखा। लाल और हरा तो बहाना है, दम तो थी नही मजनू बनने की … संस्कारों की बेड़ियाँ, समाज में बने रहने की लालसा, इज्जत, और भी बाकी इसी टाइप की चीजें बहाना मारने के काम आती हैं कि अगर ये न होती तो जाकर बोल दिया होता …… लेकिन हक़ीकत कुछ और ही होती है। ओशो ने इस कुंठा को बाकायदा समझाया है। कुछ देर तक दूर स्थित सामने वाली खिड़की पर नज़रें गड़ाये इसी द्वंद में उलझा रहा। चाँद एक बार फिर सामने था और ओस की कोमल ठंडक मेरे चेहरे पर। चाँद की गोलाकार आकृति को देख कर ज्यामिति के कुछ प्रश्न जेहन में आ घुसे और दिख रहे चाँद की त्रिज्या की माप तौल शुरु हो गयी। अभी परिधि की माप आयी नहीं कि कहीं दूर जाते वाहन में बज रहे एक गीत के बोल कान में घुस गये चाँद के पार चलो …… चाँद के पार चलो …… दिमाग घूम गया। त्रिज्या दूर रह गयी और ताजा ताजा घुसे इस वाक्य की जाँच पड़ताल विश्लेषी दिमाग ने शुरु कर दिया। प्रश्न उठा कि – ऐं… !??!? चाँद के पार चलो ?!! श्रृंगार रस में इसकी क्या महत्ता? जो पागल प्रेमी जोड़े चाँद के पार जाने को आतुर हो गये। अभी तक आर जाने में नानी मरती है ये पार जा रहे हैं। फिर भी मैनें अपने दिमाग के डाटाबेस में इस फुटेज को डालकर सर्च मारा। दिमाग ने अपने पास रखी फाइलों को चेक किया लेकिन श्रृंगार रस से जुड़ी कोई भी साहित्यिक जानकारी नही मिली। तत्पश्चात् मैने एडवांस सर्च किया कि चाँद से जुड़ी हर एक फाइल बाहर ले आओ और धड़ाधड़ जानकारी मिलनी शुरू हो गयी। सर्वप्रथम हमारे नील भैया दाँत निपोरे साक्षात खड़े हो गये बोले चाँद पर सबसे पहले मैं उतरा। हम उनकी सूरत देखते आगे बढ़े और नवीनतम जानकारी उलटने पलटने लगे। एक फाइल में हमारे देश का प्रथम, डिब्बेनुमा आकार वाला, चन्द्रयान सुशोभित था जिसे दिखा कर नायर साहब उछल रहे थे। दूसरे हिस्से मे लिखा था कि कुछ वैज्ञानिक धरती के नीचे एक बड़े होल में बैठ कर ब्लैक होल बना रहे हैं, जिससे डरपोक टाइप के प्राणी चीख रहे हैं कि विनाश हो जायेगा, आकाशगंगा नष्ट हो जायेगी। हमने प्रोसेसिंग रोक कर ज़रा दम लिया और सोचा कि अच्छा हो अगर ऐसा हो सबको एक साथ परमधाम की प्राप्ति हो जायेगी। जनम मरण के चक्र से सब मुक्त हो जायेंगे। अभी यही तक आया कि प्रोसेसिंग फिर शुरु हुई और प्रतिउत्तर में ज़वाब मिला – “नही बेटा कुछ दिन पहले ताप वृद्धि के चलते परियोजना रोक दी गयी है” हम कहे – सत्यानाश हो इसका, लगता है कभी मुक्ति नही मिलेगी। विज्ञान रस में डूबे दिमाग को एक और विज्ञान मुहर लगी फाइल मिली। बचपन से यही बोझ लादे लादे घूम रहे हैं ऐसी फाइलें मिलना लाज़मी है। मैंने फाइल चेक की जिस पर ये मुद्रित था कि चाँद अपनी धुरी पर नही घूमता नतीजन चाँद के पार मतलब चाँद के दूसरे भाग में (जो हमें नही दिखता) सदा सर्वदा अंधेरा विराजमान रहता है। जानकारी पढ़कर चेहरे पर मुश्कान आई। अच्छा !! चाँद के पार हमेशा अन्धेरा होता है, मतलब ‘ससुरे’ अन्धेरे में जाने को कहते हैं और अन्धेरा कैसा जो कभी खत्म न हो। वाह ! वाह रे प्रेमी खोपड़ी, मान गये “जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि” ‘ससुरों का दिमाग तो देखो’, कैसी गहरी बात करते हैं। पगलेठ लोग तो बूझ ही नही पायेंगे वो तो सोचेंगे कि जाय सब कम से कम धरती का बोझ तो खत्म हो चाँद के इस पार जाय चाहे उस पार … “चाँद के पार” जाकर प्रेमी नामक जन्तु की बांछे खिल जायेंगी। कैसे कैसे कृत्य होंगे चाँद के पार जाकर … राम ही जाने … या हो सकता है कि वहाँ भूतों का राज हो जो इन्हें पकड़कर अपने सरदार गब्बर भाई के यहाँ ले जाये और बसन्ती का नाच गाना शुरु हो। खैर जो भी हो … वहाँ तो प्रेम की अविरल धारा बहती होगी। धारा तो धरती के पार्कों में भी बहती है, जो दिन दहाड़े चाँद के पार का लुत्फ देती है। पार्क की घनी झाड़ियाँ ही प्रेमी समुदाय का ‘चाँद का पार वाला’ हिस्सा है। जिसमे वे रमे होते हैं। जनता से मिली जानकारी के अनुसार … सुना है कि ट्रेनों में भी ये धारा बहा करती है। जिसे देख जनता का मन भी मचल जाता है कि वो भी एक बार चाँद के पार हो आये, लेकिन भौतिक और भौगोलिक कारणों से निराश होकर वे पहाड़ पार हो आये। जनता चतुर है। रात काफी हो चली थी। मैने फालतू घूम रहे दिमाग को नियंत्रित किया और राम का नाम लेकर सो गया। राम का नाम लेना ज़रूरी था, क्या पता पीपल वाला भूत रात में किसी दूसरे लोक की सैर करा दे। वहम ही सही, राम जी से प्रोटेक्शन लेने में क्या हिचकना …
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