Manish's profileManish's spacePhotosBlogGuestbookMore ![]() | Help |
|
August 17 आखिरी पड़ाव सिन्दूरी शाम, मन्द गति से चलती हवाएँ और डूबता हुआ सूरज। इन सबसे बेखबर गाड़ियाँ नैनी ब्रिज पर दौड़ रही है और कुछ लोग चहलकदमी कर रहे हैं। कुछ लोग उफान ले रही यमुना नदी को निहार रहे हैं और कुछ थूकने के बाद थूक के प्रक्षेपण मार्ग का अवलोकन कर रहे हैं। विचरण हेतु आये सभी लोग अपने में मस्त हैं। इन्ही के बीच एक किनारे खड़ी बीस वर्षीय युवती अपने अतीत को निहार रही थी। अतीत, जिसमें वह खिलखिलाई, हँसी, मुस्कुराई और गमज़दा हुई। अतीत, जिसमें एक प्यार छिपा था माँ का, बाप का, भाई बहन का। अतीत, जिसमें लड़कपन था, अल्हडपन था और थोड़ी सी शरारत। अतीत, जिसमें उल्लास था कुछ कर गुजरने का जज्बा था। अतीत, जिसमें एक प्यार का फूल खिला था। अतीत, जिसमें फरेब था, धोखा था, छलावा था, दर्द था, दुख था। और वह अतीत, जिसमें हार थी, बेचैनी थी, घुटन थी।
सारे अतीत के पन्ने एक एक कर उसके सामने खुल रहे थे। कितनी ख्वाहिशें थी मन में लेकिन … । एक आँसू की पतली धार उसके आँखों से बह चली। लेकिन उस वक़्त इस आँसू को कोई पोछने वाला वहाँ कोई नही था और आँसुओं की यह धार लम्बी खिंचती चली गयी।
चार साल पहले ही तो वह बुन्देलखण्ड से इलाहाबाद आई थी पिता की होनहार बेटी बनकर। इलाहाबाद यूनिर्वसिटी से ग्रेजुएशन किया था और 75% अंक बटोरे थे वह भी B.Sc.(Maths) से। लेकिन सब व्यर्थ ही जायेगा शायद। कितनी खुशी से उसने M.Sc.(Maths) में प्रवेश लिया था, इस बात से बेखबर कि यह रास्ता उसके जीवन डगर को छीन लेगा। प्रवेश की खुशी अभी कम भी न हो पायी थी कि फ्रेशर पार्टी में उसे मिस फ्रेशर चुन लिया गया। इतनी खुशी एक साथ मिल जाने के कारण वह कुछ सोच समझ भी न पाई थी कि मतलबी लोगों के जाल में फँस गयी और यह जाल उसे नैनी ब्रिज पर ला खड़ा किया।
अपने अतीत की यादों में सिसकते हुए उसने एक दोस्त को फोन किया लेकिन उस दोस्त ने फोन रिसीव नही किया, दूसरे को किया लेकिन कोई उत्तर नही मिला, फिर तीसरे को, फिर चौथे को फिर……फिर और फिर। लेकिन उसके दोस्तों को अब उसकी कोई ज़रूरत नही रह गयी थी।
वह झुंझलाहट के मारे चीख पड़ी। कई दिन के तनाव ने उसके सोच समझ को जकड़ रखा था नतीजन वह नदी में छलांग लगाने को उतावली हो गयी और बिना कुछ विचार किये नैनी ब्रिज से यमुना नदी में कूद पड़ी।
शरीर का भार जो अब शून्य था, हवा का बहाव जो नदी के पानी तक पहुँचने से उसे रोक रहा था। इन सब चीजों ने शायद उसकी चेतना लौटा दी थी लेकिन तब तक देर हो गयी थी। एक जोरदार छपाके की आवाज़ के साथ वह यमुना नदी की गहराई मे दाखिल हो गयी। मटमैले पानी के स्वाद से उसका मुँह भर गया। पानी की एक तेज़ धार उसके आँसुओं को धुलती हुई अन्दर तेजी से बढ़ी। इसने उसे रोकना चाहा लेकिन मुँह अनायास ही खुल गया और पानी की वह धार गले से नीचे उतर गयी। उस समय वह पानी से बाहर आने के लिये बुरी तरह छटपटा रही थी। हाथ पैर तेजी से हिल रहे थे लेकिन सब व्यर्थ। आँखे मिट्टी से भर गयी और एक भयानक अंधेरा उसके सामने तैर गया। उसे सहायता की ज़रूरत थी लेकिन सहायता इस तेज बहाव के कारण काफी पीछे छूट गयी। उसका दम घुटने लगा और जीवन के सारे दृश्य अचानक ही उससे होकर निकल गये और दिल ने धड़कना बन्द कर दिया। वह निढाल सी होकर तलहटी में घिसटने लगी। घिसटते-घिसटते वह बहुत दूर निकल गयी। इतनी दूर कि कोई अपना उसे ढूँढ न पाये।
नैनी ब्रिज से कई खुले मुँह और फटी आँखे उसे पानी में तलाश रही थी।
कितनी अजीब बात है जब वह इलाहाबाद आई थी तो नैनी ब्रिज निर्माणाधीन था। शायद उसके जीवन का आखिरी पड़ाव यही था।
या फिर वह अभी भी सफर कर रही होगी नदी की तलहटी में घिसटते हुए……
उसके सड़ चुके बदन को कई कीड़े चाट रहे होंगे और वह किसी जंगल में नदी के किनारे लग गयी होगी। उसका सुन्दर शरीर जानवर खा रहे होंगे।
शायद आखिरी पड़ाव से गुजरना अभी बाकी है।
नोट – अभी कुछ दिन पहले घटी इस घटना ने मन को व्यथित कर दिया। मैनें अपने जीवन का सातवाँ सहपाठी खोया है। इलाहाबाद यूनिर्वसिटी से B.Sc.(Maths) करते समय भी मैने एक दोस्त को खो दिया था। TrackbacksThe trackback URL for this entry is: http://manish2god.spaces.live.com/blog/cns!E262EDF52352134C!282.trak Weblogs that reference this entry
|
|
|