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September 14 ज़रा इन्हें भी जानिए …ये हैं चूहा और चिड़िया लेख के नायक। मैनें इन्हीं के बारे में बात की थी। पहली मर्तबा जब इनसे मुलाकात हुई तो ये जनाब बहुत शर्मीले टाइप के लगे। ये बगल वाले कमरे में बतौर किरायेदार हैं और हम लोगों के पड़ोसी भी। पढ़ाई के शान्त महौल में जब इनकी किलकारियाँ सुनने को मिलती हैं तो दिमाग अनायास ही उस तरफ चला जाता है। इनकी किलकारियों में ढेर सारे प्रश्न होते हैं, जितने प्रश्न मैने अपने जीवन काल मे हल किये होंगे उतने तो ये एक ही दिन में पूछ डालते हैं। अगर किसी को बेसिक प्रश्नों के भण्डार चाहिये तो इनसे आकर मिल ले। अपने फुर्सतिया समय में ये अपने अनोखे प्रश्नों से अपनी मम्मी का सिर खाते हैं और अति हो जाने पर एक झापड़ मम्मी की तरफ से मिलता है और प्रश्नों के स्थान पर चिल्लाने की आवाज आ जाती है। पिछली बार ये चूहा और चिड़िया को लेकर कन्फ्यूज थे। अबकी बार या कहे हर रोज अपने एक प्रश्न से बखेड़ा खड़ा कर देते हैं। अभी कल रात की बात है इनको दूध पीने की तीव्र इच्छा जाग उठी। बोले – मम्मी दूध चाहिये। मम्मी दूध गरम करने लगी लेकिन इनको इन्तजार बिल्कुल पसन्द नही। चीख कर बोले – मम्म्म्म्मी दूऊऊऊध ………। मम्मी बोली - बेटा दूध गरम हो रहा है। ये थोड़ी देर चुप रहे। फ़िर चीखे – मम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्मी मैने कहा दूऊऊऊऊऊऊउध …………। अबकी बार मम्मी का धैर्य छूटा और झापड़ रसीद करने के इरादे से किचन से बाहर आईं और बोली – चिल्ला क्यों रहे हो??????? इन्हें जब लगा कि अब मार पड़ेगी तो एक लम्बी मुस्कान लाते हुए बोले – मजाक कर रहा था। इनका यह लुभावना शब्द सुनकर सभी को गुदगुदी होने लगी और कोई भी अपनी हँसी रोक न सका। वैसे भी अभी इनकी आवाज में तोतलापन है जो बातों को और भी मजेदार बना देता है। पिछले दिनों ये शर्माते शर्माते मुझसे बोलने बतियाने लगे और अपने प्रश्न का पिटारा मेरे सम्मुख भी रख दिये। पहले मैं सोचता था कि ऐसे बच्चे बड़े ही होनहार होते हैं इनको सही गाइड लाइन मिल जाये तो ये कोई न कोई आविष्कार कर दे लेकिन उस दिन मुझे ऐसा लगा कि इनकी मम्मी सही हैं और मैं गलत। इनको लतियाना ही उचित है। उनके प्रति मेरी इस सोच में उनके प्रश्नों द्वारा मिली झल्लाहट थी। बाद में मुझे एहसास हुआ कि ये तो मेरी कमजोरी है। वास्तव में मैं इन्हें समझा नही सकता। अब इनके प्रश्न ही ऐसे होते हैं कि उत्तर सूझता ही नही या तो सही बात बतायें या फिर बहका दें जो कि उचित नही है। कुछ प्रश्न … दूध सफेद क्यों होता है ? अब इसका उत्तर बताने से पहले इन्हें रसायन शस्त्र पढ़ाना होगा। बल्ब जलता क्यों है? पंखा चलता क्यों है? ये सब समझाने के लिये इन्हें भौतिकी का ज्ञाता बनाना पड़ेगा। इनके प्रश्न मे एक प्रश्न शामिल है जो कि प्रश्नों का अम्बार लगाने के लिये काफी है वो है – “ये क्या है?” “ये क्या है?” से सिलसिला चलता है और पता नही कहाँ पहुँच जाता है। ये तो रही इनकी पहली खूबी दूसरी खूबी तो और मजेदार है। ये पैदा होने से पहले ही सामाजिकता में पीएचडी कर लिये थे। मैं तो सोच कर दंग रह जाता हूँ कि ऐसी बाते ये छोटे जनाब कैसे जानते हैं। एक बार मैं कपड़ो को स्त्री कर रहा था कि अचानक कुछ खराबी आ गयी। मैने ये बात ऐसे ही इनसे कह दिया ये तुरन्त ही बोले मेरा तो खो गया है नही तो लाकर दे देता। एक दिन मैं बालकनी में बैठा शाम के कुछ बादल देख रहा था कि ये आये और बतियाने लगे। मैने एक उड़ती हुए बड़ी तितली को देखा और इनसे पूछ बैठा – ये क्या है? ये बोले – मच्छर !!! मैं हँसने लगा। तो ये तपाक से बोले – हँस क्यों रहे हैं मैं तो मजाक कर रहा था। अभी कुछ देर पहले हमारे मित्र भूला राही जी भूले भटके मेरे यहाँ पधारे और अपने हाथों से दही को लस्सी मे परिवर्तित करके खुद पिये और मुझे भी पिलाये। इतने में नन्हें सरकार एक फोटू वाला एलबम लहराते हुए आये और दिखाने लगे। मैं चित्रों को देखने लगा और जब इनकी फोटो आई तो बोले – धीरे धीरे देखिये। जल्दी-जल्दी क्यों देख रहे हैं। महान हैं आजकल के बच्चे और इस महानता मे ये छोटे सरकार सर्वोपरि हैं। इन्ही के बहाने अर्धशतक लगाने का भी मौका मिल गया। ------------> हिन्दी अपनी मातृ भाषा है। इसे प्रज्ज्वलित रखना हम सबका कर्तव्य है। (हिंदी दिवस ………………) September 08 प्रेरणा के श्रोत5 सितम्बर का दिन, आज सुबह 4:00 बजे ही जग कर स्नान पूजा पाठ और ध्यान किया। इसके पश्चात संगम तक टहल आने की इच्छा हुई। संगम पर स्थित बड़े हनुमान जी के दर्शन करने के बाद मैं वापस अपने कमरे पर लौट आया। कुछ किताबों में सिर खपाने के बाद भोजन बनाया और बाकायदा खा पीकर कालेज के लिये प्रस्थान किया।
कालेज तक पहुँचने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है पहले तो साइकिल भण्डार से अपनी साइकिल को सही सलामत निकालना पड़ता है निकल गयी तो यह देखना पड़ता है कि हवा पानी है कि नही अगर है तो ठीक, नही तो जेब टटोलनी पड़ती है कि छुट्टे पैसे हैं कि नहीं… सब इन्तजामात करने के पश्चात साइकिल पर सवार होकर उसे खीचते खीचते मुख्य सड़क पर आना होता है। सड़क पर आते ही कुछ गति साइकिल पकड़ती है और मन गुनगुनाने लगता है “डम डम डिगा डिगा …”। अभी मन गुनगुना ही रहा होता है कि सामने से प्रेमिकाओं (भैंसों) का एक बड़ा झुण्ड दिख पड़ता है ये प्रेमिकायें सुबह सुबह ही बाँध के उस पार स्थित सरोवर के निर्मल जल से सराबोर होकर रास्ता रोकने हर रोज ही चली आती हैं। कुछ तो मेरे आगे जाने के विरोध में सड़क पर ही पसर जाती हैं और कुछ मोतियों (कीचड़) से सना अपना पल्लू (पूँछ) मेरे मुँह पर दे मारती हैं। इन सब से लड़ता भिड़ता किसी तरह अपने कालेज पहुँचता हूँ। लेकिन यहाँ भी एक परेशानी खड़ी हो गयी है पहले अपने जे के इंस्टीट्यूट तक अपना साधन ले जाने की इजाजत थी लेकिन अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन के चलते अपना सब कुछ मुख्य द्वार पर ही छोड़कर आगे बढ़ना होता है। टोकन है तो ठीक नही तो छुट्टे के लिये फिर जेब टटोलिये और दो रूपये देकर आप अपनी साइकिल स्टैंड में खड़ा कीजिये। मुख्य द्वार से अपनी कक्षा तक जाते जाते ऐसा महसूस होता है कि विश्व के चार चक्कर लगा लिये। ऐसा महसूस होना भी चाहिये आखिर आजकल लोग ज्यादा पैदल चला ही कहाँ करते हैं। इन सब हालातों से गुजरते आज मैनें कक्षा में धीरे से झाँका कि कहीं सिन्हा सर आ तो नही गये। लेकिन अभी तक सिन्हा सर पधारे नही थे केवल कुछ छात्र ही दिखे। आज मौसम सुबह से ही खुशनुमा था बादलों से पूरा आसमान ढका था और कुछ बूँदे रह रह कर टपक पड़ती थी। कक्षा में प्रवेश करने के बाद मैने अपनी सीट पकड़ ली। कुछ छात्र ब्लैकबोर्ड पर फूल पत्ती बना रहे थे, टीचर्स डे के अवसर पर। कुछ देर तक उनकी कलाकृतियाँ देखने के पश्चात मैनें अपनी आँखों को विश्राम दिया। कुछ देर बाद सिन्हा सर कक्षा में प्रवेश किये और हम सबने उन्हें विश किया। कक्षा में कम छात्रों को देखते हुए उन्होनें कुछ देर बाद अध्ययन प्रक्रिया शुरू करने की बात कही और अपने कुछ विचार हम लोगों के साथ बाँटना शुरू किये। आज उनकी बातें बहुत प्रेरणादायक थी और हमेशा ही रहती हैं लेकिन आज की बात कुछ अलग थी कुछ संवेदना थी कुछ लचक थी उनकी बातों में। आज उन्होनें अपनी यादों को हमारे सम्मुख रखा। जिसमें त्याग की सुगंध थी। आज से पहले मैनें उनके जीवन में इतना नही सुना था। एक सुखी इन्सान के पास जो होना चाहिये वह है उनके पास। लेकिन जो कर सकने की तमन्ना उनके हृदय में है शायद अभी वह बाकी ही है। छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति उनका समर्पण पूज्यनीय है। आज जो बातें उन्होने बतायी उनसे एक सबक लिया जा सकता है। वैसे भी चैट के दौरान विदेशों में रह रहे उनके भूतपूर्व छात्र अकसर उनके बारे में पूछते हैं और इनकी बातें जानने का मौका मिलता है।
लेकिन आज उन्होनें अपने पिता जी के बारे में कुछ बातें बताईं जिसे सुनकर आत्मविश़्वास बढ़ा और इस आत्मविश्वास ने मुझे वे दिन याद दिला दिये जब मैं चार साल का था और उन दिनों अपनी नानी के यहाँ था। नानी के घर के पीछे ही छोटा सा प्राइमरी स्कूल था और उस स्कूल के पण्डित जी मेरे नाना के परम मित्र थे। उनका घर चार कोस दूर था। रोज़ आना जाना मेरे नाना जी को अच्छा नही लगता सो पंण्डित जी को अपने यहाँ ही रोक लेते और शनिवार को ही मुक्त करते। नानी का घर चारों तरफ लगे बाग के बीचोंबीच था और जंगल की एक कुटी जैसा दिखता। गाँव की शुरूआत तीन चार बाग छोड़कर शुरू होती। पंण्डित जी का मन ऐसे महौल में ज्यादा रमता और मेरा भी। नाना जी ने खास हिदायत दे रखी थी कि हम लोगों को पण्डित जी से पढ़ना है। लेकिन हम लोग (मैं और दीदी) इस झंझट से दूर रंगीन तितलियाँ पकड़ने में पूरा समय बिताते और कच्चे आम को सुतुही (बड़े सीप को घिस कर बनाई गयी छिलनी) से छील कर खाते। बागीचे के दूसरे छोर पर जहाँ से खेतों की शुरुआत होती थी वहाँ पर हमारे नाना जी की एक मध्यम आकार की झोपड़ी थी जहाँ वे सोते और दिन भर खेतों पर नजर रखते। वही बगल में ही पण्डित जी के लिये भी एक कुटिया नाना जी ने बनवा दी थी। सुबह होते ही पण्डित जी नहा धोकर रामचरितमानस का पाठ शुरु कर देते और नाना जी हम लोगों को जगा कर वहाँ ले जाते। उनका मानना था कि सुबह के समय पढ़ी गयी चीजें याद रहती हैं पहले तो हम लोग वही बैठ कर उनका पाठ सुनते फिर पण्डित जी हम लोगों को वर्णमाला के अक्षर बताते फिर गिनती और पहाड़े। यही क्रम रोज़ चलता लेकिन एक दिन मैं चुपके से उनकी कुटिया मे घुस गया और उनकी किताबें टटोलने लगा। एक मोटी सी किताब को देख कर मैं आश्चर्य चकित रह गया और उस दिन जाना कि किताबें मोटी भी होती हैं। उसे उठाकर उसे उलटने पलटने लगा उसमे कुछ अलग अक्षर लिखे थे। वर्णमाला वाले अक्षर कही नही दिखे। इतने में पण्डित जी पूजा समाप्त करने वाला दोहा पढ़ने लगे और मैं भाग कर बाहर आ गया। उस दिन मैं दीदी से बताया कि पण्डित नाना के पास ढेर सारी किताबे हैं और उसमे अजीब अजीब लिखा होता है। दीदी भी मेरी तरह खोजी प्रवित्ति की थीं नतीजन दोपहर के समय हम लोग घूमने का विचार छोड़ कर पण्डित जी के कुटी पर धावा बोल दिये और किताबों को उलटने पलटने लगे मैं तो एक किताब लेकर बैठ गया और उसमें छपे जीव जन्तुओं के चित्र देखने लगा। शाम तक हम लोग केवल चित्र ही देखते रहे कि अचानक पण्डित जी आ गये। हम लोग डर गये कि आज जबर्दस्त डाँट पड़ेगी लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ पण्डित जी आये और बगल में बैठ गये। सिर पर हाथ फेरते बोले – “पढ़ाई हो रही है?” दीदी ने तुरन्त ही बक दिया कि मैने ही कहा था कि आपके पास किताबें हैं। वह हँसने लगे फिर समझाते हुए बोले देखो ये विज्ञान की पुस्तक है और ये भूगोल की और ये मोटी पुस्तक प्राणिशास्त्र की है। उन दिनों मैं बोलने में माहिर था। तुरन्त पूछा कि ये क्या है। मैने अंग्रेजी भाषा मे लिखे अक्षर की तरफ इशारा किया था। शायद उस दिन उन्हें हम लोगों को अंग्रेजी सिखाने की प्रेरणा मिली थी। क्योंकि तब के ज़माने में कक्षा छः से अंग्रेजी पढ़ाना शुरू होता था। अगले दिन से हम लोग ए बी सी डी पढ़ना शुरू कर दिय्रे। उनके पढ़ाने के तरीके बिल्कुल अलग थे वे रटाते बिल्कुल न थे। वे समझाते थे हर एक चीज …। हम लोग जोड़ घटाना अक्सर गलत कर देते तो वे हम लोगों को मारने के बजाय कुछ और तरीके बताते। जैसे मिट्टी की गोली बना कर जोड़ना, खड़ी पाई खींच कर जोड़ना, उंगली पर जोड़ घटाना करना। उस छोटी उम्र में वे वैदिक गणित की तकनीकें हमें समझाते। हम लोग उस समय के अव्वल छात्र थे। एक दिन पण्डित जी के एक दोस्त ने हम लोगों को 1 से 20 तक पहाड़ा लिखने को दिया और हम लोगों ने झटपट लिखकर दिखा दिया लेकिन वे अभिमानी टाइप के थे तुरन्त ही पूछना शुरू किया वो भी 13, 15, 17, 18, 19 के पहाड़े जो कि मुझे याद ही नही रहते। तुरन्त उन्होंने टिप्पणी की कि हमारे गाँव का फलाने का लड़का तुरन्त बता देता है। इन सबके बावजूद उनके जाने पर पण्डित जी ने कहा – बुरा मत मानना वह संकीर्ण दिमाग का था। उनकी इस बात मे प्रोत्साहन छिपा था। एक साल बाद पापा नानी के यहाँ आये और हमें शहर वाले घर (जो बनकर तैयार हो चुका था) ले जाने लगे। रोने का एक सिलसिला चल पड़ा था। दीदी नानी से लिपट कर रो रही थी कि कहीं नही जाना है और मैं रोते हुए सबसे उंचे आम के पेड़ पर चढ़ गया था कि मैं नही जाउँगा। अंततः वह घड़ी आ गयी थी जब हम अपने खेलने कूदने वाले समय को विदा कहना पड़ा और उस सपनों के घर को छोड़ कर चिल्लपों करते शहर वाले घर में आना पड़ा। पण्डित जी उस समय अपने घर गये हुए थे आते समय उनके पैर भी न छू पाये थे हमलोग। समय बीतता गया। शहर वाले घर के पास एक स्कूल में हम लोग पढ़ने लगे। यहाँ ज्यादातर शिक्षक ग्रामीण ही थे और ज्यादा पढ़े लिखे नही थे। हम लोगों के अन्दर विशेष योग्यता को देखते हुए कक्षा 3 और 4 न पढ़ाकर सीधे पाँच मे भेज दिया गया। कुछ साल बाद नानी के यहाँ जाने का मौका तो मिला लेकिन वहाँ पण्डित जी न मिले। सुना कि वे रिटायर हो गये और बच्चों के घर चले गये। लेकिन अपनी सारी किताबें हम लोगों के लिये रख गये। उस दिन आँखें उसके लिये डूब गयी थी जिससे डर लगता था। शायद समय ने करवट बदल ली थी। कुछ दिन बाद ही मुझे बहुत तेज बुखार पकड़ लिया। जिससे मेरा शरीर पूरी तरह टूट गया और मेरी आवाज लड़खड़ाने लगी कुछ दिन तो मैं बोल ही न सका था। बुखार से निकलने के पश्चात मैं एक हकलाने वाला लड़का बन गया। यही एक बात मेरे दिल और दिमाग पर ऐसी छाई कि पढ़ाई पर से नियंत्रण छूट गया। फिर तो फेल पास होते होते यहाँ तक पहुँच आया। तब से आज तक जलालत भरे शब्द सुनते चले आ रहे हैं खुद के लिये… ऐसे मे कोई प्रोत्साहन नही मिला। बस पण्डित जी की याद आती है और उनके वो प्रोत्साहन भरे शब्द …… आज स्थिति यह है कि उत्तीर्ण होने के लिये भी मशक्कत करनी पड़ती है। स्वास्थ्य का कोई भरोसा नही कब बिफर जाय। सच कहा जाय तो मन ही नही लगता। लेकिन इसी बीच सिन्हा सर के शब्दों ने कुछ आशा जगाई है। आज से एक नयी शुरुआत करने की तमन्ना है। सोच रहा हूँ कि अपनी इस बात को सिन्हा सर तक पहुँचाया जाय। ताकि जब भी उन्हें समय मिले वे ऐसी बाते बतायें जिससे हम सब कुछ सीख सकें। साथ में उन्हें भी इस बात का भी आभास हो कि उनकी बातें जाया नहीं हो रही हैं हम उन्हें बारीकी से सुन रहे हैं और अपना भी रहे हैं।
लेकिन इस बात का डर भी है कि कहीं डाँट न पड़ जाये और इस बात का भी कि क्लास में खड़ा करके अपने विषय के कुछ प्रश्न न पूछ बैठे। न बता पाने पर डांटना शुरू कर दे कि फालतू लिखते हो पढ़ा लिखा भी करो। वैसे भी अभी तक मुझे कुछ आता जाता नही। कहीं ऐसा न हो जाय कि इंट्रो के खिलाफ मेरे लेख (जूनियर बनाम सीनियर) से भड़के मेरे साथी फिर से न उखड़ जाय कि अब टीचर के उपर लिखता है। लेकिन इन सब के बावजूद इस विश्व पटल पर अपने इन शब्दों को रखने से भला कौन रोक सकता है? - मनीष |
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