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    July 27

    हाय रे इलाहाबादियों

    allahabad ke log

           वैसे तो इलाहाबाद मशहूर शहर है। पौराणिक काल से इसका नाम लोगों की जुबाँ पर चलता-फिरता है। इन दिनों इलाहाबाद के रहने वाले खासकर गरीब तबके के लोग, जो कभी स्कूल नही गये, वे ऐसी हरकते करना शुरू कर दिये है कि लोग कभी इलाहाबाद का नाम भूल भी न पाये।

     

         अगर आप स्टेशन पर उतरे और मेन गेट से बाहर आये तो पहले यही लोग आपका स्वागत करते हैं। फूल माला न सही अपनी आटो में जबर्दस्ती तो बैठा ही देते हैं। अगर आपने कुछ ज्यादा शरीफ बनने की कोशिश भी की तो लुट जायेंगे।

     

         और ये लोग स्टेशन को ‘टेशन’ कहते हैं कोई बाहर से आये और बोले भाई स्टेशन जाना है तो ये आश्चर्य से कहेंगे “टेशन”!!! मानो सही शब्द यही जानते हैं।

     

              खैर बाते तो कई हैं लेकिन पिछ्ले दिनों एक हरकत दिखा दी इन्होनें। सरकार गिरने वाली थी पढ़े लिखे लोग हर नुक्कड़ पर यही चर्चा करते। नतीजन इन्हें भी जानने की जिज्ञासा हुई कि आखिर देश में हो क्या रहा है। कही पाकिस्तान ने हमला तो नही कर दिया।

     

             आनंद भवन के सामने सरकार बचाने हेतु हवन होने वाला था। एक इलाहाबादी बड़े रौब से अपनी बगल वाले से कहा – अमे!! का होत है? जवाब मिला – सरकार गिरने वाली है। इलाहाबादी ने फिर पूछा – मायावती वाली कि सोनिया वाली ???

     

     

                  लेकिन इस बार जवाब नही मिला बस एक जोरदार ठहाका उठ पड़ा और कोई समझदार इलाहाबादी बोला – हा हा ……… इ माधर… का नही पता। अमे! का जानते हो कुछ जानते भी हो।

     

            इनके कुछ शब्द भी जरा हट के होते हैं। रिक्शे को रिश्का, बुशर्ट को बुशकट,अमरूद को अरमूद, पैन्ट को पाइन्ट, फ़ैक्टरी को फैटकरी आदि आदि।

     

            एक बार अखबार पढ़ते हुए एक इलाहाबादी ने अपने मित्र से पूछा – अमा यार !! इ “युवती” नाम की लड़की के साथ आजकल बहुत लफड़ा हो जा रहा है। कल छपा था युवती के साथ बलात्कार और आज छपा है युवती की हत्या। पहले भी कई बार इसका नाम अखबार में आ चुका है किसी के साथ भागी भी थी। इतना सुन कर उसके दोस्त नें गालियों से नवाज़ते हुए उसे समझाया था कि 18 से 25 बरस की लड़कियों को युवती कहते हैं।

     

    इनके ऐसे कारनामों की फेहरिस्त काफी लम्बी है।

     

      धन्य है इलाहाबाद और धन्य हैं ऐसे इलाहाबादी !

    July 24

    थोड़ा सा स्नेह

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            आज कथित छुट्टियों के बाद कालेज गया था। पहले ही दिन, बड़े दिनों तक चुप बैठे प्रोफेसर साहब ने सारी कसर निकाल ली। इलेक्ट्रोमैगनेटिक थ्योरी पर इतना लम्बा चौड़ा व्याख्यान दे दिया कि अन्त तक आते आते कई सूरमों के दिमाग की इलेक्ट्रोमैगनेटिक फ़ील्ड पर खतरा मडराने लगा। कई तो वही ढेर हो गये इसके बावजूद कुछ ने एक नया रास्ता अख्तियार किया, बाहर बारिश हो रही थी लेकिन प्यास से व्याकुल होने का नाटक किया और धीरे से निकल लिये।

     

            उनकी कैद से छूटने के बाद हमने लाइब्रेरी की तरफ रूख़ किया कि शायद कोई हसीन चेहरा दिख जाय जो किताबों में अपनी आँखें गड़ाये हो और हम उस पर गड़ायें। लेकिन निराशा हाथ लगी। कोई तो नही दिखा पर लाइब्रेरी के रखवाले नें देख लिया और बोला – हाँ भाई, तो फाइन के 50 रूपये कब देंगे? आप किताब महीनों तक पढ़ते हैं 20 दिन में एक बार लौटा दिया कीजिये। हम दुख़ के साथ जरा सा मुस्कुराये कि चलो कोई तो समझता है कि हम किताबें महीनों पढ़ते हैं। परन्तु मुस्कुराहट कायम नही रही 50 रूपये लुटा कर बाहर आ गये।

     

                 बारिश के नाम पर कुछ बूँदें आकाश से टपक पड़ती थीं। मौसम खुशनुमा बना था और मैं दोस्तों से विहीन प्राणी, बस टुकुर टुकुर गिरती हुई बूँदों को निहारता। कुछ पल बाद अपने 4 गुणे 5 साइज वाले कमरे पर जाने की इच्छा हुई और हम कालेज से निकल लिये। अभी कुछ दूर ही आया था कि रास्ते में लाचार और अपने में मस्त गायों को देखा जो सड़क पर, सड़क के किनारे ऐसे बैठी थी मानो मातम मनाने बैठी हैं।

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            इतने में एक लड़का उधर से गुजरा और बैठी हुई एक गाय को धीरे धीरे सहलाने लगा। अचानक मिल रहे स्नेह से गाय चौकीं और दोनों कान इकठ्ठा कर एक नज़र उस लड़के पर डाली। लड़का पुचकारने लगा नतीजन गाय भी स्नेह से विह्वल होकर खड़ी हो गयी। लड़के ने गाय के थन को गौर से देखा और पीछे लगी दुकान की तरफ मुँह करके चिल्लाया – पगला सारे ! इ गाय दूध नै देई। इतना कहकर उसने गाय को एक जोरदार घूँसा लगाया। स्नेह के बाद अचानक मिले इस प्रहार से गाय वहाँ से भागी। लेकिन कुछ दूर जाकर उसने उसी प्रेम भरे अंदाज में उस लड़के को देखा।

     

    शायद वह थोड़े से मिले स्नेह का कर्ज उतारना चाह रही थी।

    July 22

    सुंदरियाँ जल चढ़ा रही है और भोले साइकिल सीख रहे हैं…

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           बात जब साइकिल की हो तो छुटपन के दिन याद आते हैं कि कैसे दूसरों को साइकिल पर देख खुद साइकिल पर चढ़ने का भूत सवार हो जाता था। कई बार तो अपने आगे के दोनों दाँत तोड़ लिये थे साइकिल पर चढ़ने के चक्कर में। लेकिन ससुरी साइकिल दो पग चलने को तैयार ही न होती खुद ही घसीटते फ़िरते और ऐसी (उँची नीची) जगह लेकर जाते जहाँ किसी की सहायता के बिना गद्दी (सीट) पर बैठने का सौभाग्य मिलता। देर तक गद्दी पर बैठ कर उस पर हुमचते (उछलते कूदते) कि बस अब साइकिल दौड़ रही है। हुमचने के चक्कर में पता चलता कि वही खड़े खड़े गिर पड़े और घुटने से खून बह रहा है घाव छिपाने के चक्कर मे देशी टाइप की टेम्परेरी मरहम पट्टी भी कर लेते, जैसे कि घाव पर ढेर सारी मिट्टी उंडेल कर बाकायदा पालिश और मालिश करते, और कुछ दिन बाद घाव रोने लगता, मवाद और खून के साथ। एक बार अपनी प्रेयसी को दिखाने के चक्कर मे उसके सामने ही उलट पड़े थे और जोर से हँसी थी वह। तब से गली मे सीखने के बजाय खेतों की तरफ रूख किया था। वहाँ भी हमने अपनी कला कृतियाँ दिखाई थी, फसल से भरे पूरे खेत में हमने साइकिल दौड़ाई चूँकि वहाँ गिरने से ज्यादा चोट नही लगती सो वहाँ इतनी बार गिरे कि गिरने का डर ही खत्म हो गया और थोड़ी बहुत साइकिल चलाना सीख गये।

     

             कुछ दिन बाद एक और समस्या आन पड़ी। अकेले तो हिलते डुलते साइकिल सँभाल लेते थे लेकिन जब डबलिंग की बात आती तो घुटना अपने आप दर्द करने लगता। लेकिन साइकिल पर बैठने और बैठाने की बात से इतना उत्साहित होते कि अपना तो अपना दूसरे का भी घुटना फोड़ डालते, और दूसरा चीखता चिल्लाता गालियाँ देता पैदल ही रवाना हो जाता और हम अपने घुटने की चिंता छोड़कर साइकिल के घुटने के उपर विचार करते कि कहीं हैंडिल टेढ़ा तो नही हो गया। अगर वास्तव में टेढ़ा होता तो अपने घुटनों के सहारे उसके टेढ़ेपन को दुरुस्त करते और सफर शुरु कर देते। सफर कितने मिनट तक निरन्तर चलता इसकी गणना उँगली पर की जा सकती है।

     

             कई दिनों की मशक्कत के बाद काफ़ी सुधार आया और इच्छा जगी कि आज अपनी प्रेमिका को दिखा देते हैं कि हम कितने चैम्पियन हो गये हैं। यही सोचकर साइकिल का रूख उसकी घर की तरफ़ किए , एक निराले अन्दाज में मैं आगे बढ़ रहा था कि कीचड़ भरे कुछ पदार्थ मेरे और मेरी साइकिल के उपर आकर बैठ गये। घूम कर देखा तो मेरी प्रेमिका अपने प्रेमी की कमर में हाथ डाले उसकी मोटरसाइकिल पर सवार थी और मुझे देख एक बार फ़िर हँस पड़ी।

     

                 उपरोक्त चित्र को देख कर अपने साइकिल सीखने की घटना याद आ गयी थी। लेकिन एक बात नही समझ में आई कि भगवान शिव को क्यों साइकिल सीखने की जहमत उठानी पड़ रही है लगता है कम्पटीशन वहाँ भी बढ़ गया है। पार्वती जी हर रोज किसी और देवता के वाहन पर सवार होकर मार्केटिंग करने चली जाती होंगीं तब बेचारे शिव जी मुँह लटकाये यह सोच रहे होंगे कि काश मैं भी आधुनिक वाहन चलाना सीख जाता तो उसकी पत्नी को मार्केटिंग कराने का सौभाग्य मिल जाये।

     

          आजकल यही तो हो रहा है स्वर्ग में भी , नरक में भी। सर्वप्रथम इन्होने साइकिल सीखने का बीड़ा उठाया और जरा गौर फरमाइये, ज़नाब रात में साइकिलिंग का लुत्फ़ उठा रहे हैं मतलब ओवर टाइम करना स्वर्ग में भी शुरु हो गया है। इस नये युग में बेचारे नन्दी को भी अपनी नौकरी पर खतरा मडराता नज़र आ रहा है जिसके कारण वह भी पीछे पीछे लगा हुआ है आम भाषा में पिछल्ग्गू हो गया है।

     

            जैसा कि सर्वविदित है कि सावन शुरु हो गया है और सावन के सोमवार भी। नतीजन दिन भर तो ये सुंदरियों से घिरे रहते हैं किसी सुंदरी को अच्छे वर की चाह होती है और किसी को यह चाह होती है कि जो वर बोझ दिया गया है वह अच्छा हो जाय। कई सुन्दरियां इतनी खातिर कर देती है कि हद हो जाती है, जितनी माँगें होती है उतनी बार शिव जी को नहला देती है। हमारे शिव जी सावन में इतनी बार नहला दिये जाते हैं कि साल भर का कोटा पूरा हो जाता है।

     

           मनुष्य की चाहत देखिये नहला नहला कर माँग रहे हैं और नही देंगें तो डुबो देंगें ये चेतावनी भी दे दी जाती है। चेतावनी तो दूर की बात अभी कुछ दिन पहले बेचारे डुबो दिये गये थे और कैद कर लिये गये थे। जिससे कई चैनलों की टी आर पी बढ़ गयी थी और हमारे बाप का टीवी देखने का समय भी।

     

             आज सुना है कि संसद में युद्ध होने वाला है और इसके लिये पूजा पाठ भी होगी, हवन भी होंगे। सावन में यही एक देवता बचे हैं जिससे कुछ उम्मीद होती है। तो बस यही उम्मीद है कि आज ये धुएं मे सुलगाये जायेंगे और ढेर सारा पानी इनके सिर पर उड़ेला जायेगा।

     

              अगर सरकार बच गयी तो प्रसाद भी मिलेगा।

     

            इन सब खुराफात से दूर भगवान शिव आज भी भीगी चाँदनी में साइकिल सीखने ज़रूर जायेंगे क्योंकि डर है कि पार्वती का साथ न छूट जाय। नन्दी भी पीछे जायेगा क्योंकि इसे भी डर है कि इतनी रायल नौकरी न छूट जाय।

     

                   एक डर ने पूरी दुनिया को जीवित रखा है …

                                                   - मनीष

    July 18

    चूहा और चिड़िया

     

               एक छोटा सा बच्चा एक नन्हीं सी चिड़िया को देखकर चिल्ला उठा – “मम्मी – मम्मी देखो चूहा”। उसकी माँ पहले तो जोर से हँसीं, फिर समझाते हुए प्यार से बोलीं – “बेटा ये चूहा नही है ये चिड़िया है, चिड़िया उड़ती है लेकिन चूहा नही उड़ता, चूहा ज़मीन पर चलता है, देखो-देखो चिड़िया उड़ गयी”।

            बच्चा आश्चर्य से अपनी माँ की बातें सुनता रहा। साथ ही कुछ दूरी पर बैठे उसके पिता इस वार्तालाप को सुनते रहे और इन्होनें अपना बयान दिया – “साले यही सब देश के भविष्य हैं , छः साल के लौंडे अभी चूहा और चिड़िया मे फ़र्क नही जानते, हम जब इतने बड़े थे तो कई साँप नचा कर फेक दिया करते थे और ये नई पीढ़ी के बोझ साले , चींटी और काकरोच से डरते हैं। हे भगवान आने वाले समय मे क्या होगा”।

        उन्होने एक गहरी साँस ली और अपनी दुनिया में खो गये।

    July 13

    एक गूँजती आवाज – दही होऽऽऽऽऽऽऽऽओ : लघुकथा

     

    सुबह का समय , एक छोटे से गाँव की तरफ़ से आता धूल भरा रास्ता, जिस पर दो नन्हें कदम तेजी से भागे चले आ रहे है । आँसू भरी उसकी दोनों आँखें धूल से सन गयी है ।

    वह दौड़ता हुआ पुराने पोखरे की तरफ जा रहा है जहाँ जाने से वह बहुत डरता है । बचपन में वह अपनी माँ से सुना करता था कि पोखरे के पास एक बरगद के पेड़ पर एक बहुत बड़ा दैत्य रहता है । लेकिन आज वह बिना डरे उस तरफ भागा चला जा रहा है ।

    वहाँ जाकर उसने उस बरगद की मोटी जड़ों को लात से मारना शुरू कर दिया कि अभी दैत्य आयेगा और उसे मार कर खा जायेगा, ऐसा उसने सुना था । वास्तव मे वह वहाँ मरने के लिये आया है । काफी देर तक हाथ पाँव मारने के बाद वह थक गया लेकिन कोई दैत्य नही आया । वह वही बरगद की मोटी जड़ पर बैठ गया । अपने धूल भरे चेहरे को पोछता हुआ सिसकने लगा और बुदबुदाने लगा कि मैं दही बेचने नही जाउंगा चाहे मुझे मार दो , मैं नही जाउंगा । सिसकते सिसकते उसे नींद आ गयी और पोखरे की तरफ से आती ठंडी हवाएँ उसे सहलाने लगी ।

    बरगद की पत्तियाँ उस हवा मे कुछ गुनगुनाने लगी । उसे कुछ सपने आ रहे थे जो उसे अतीत में खींचने लगे ।

    उसके पिता उसे कंधे पर बिठाकर गाँव में घूमते और वह खुश होता उनके बाल नोचता । वह अपने पिता का लाडला बेटा था । कुछ महीने पहले उसके पिता एक दुर्घटना मे मारे गये थे और चाचा ने उसके घर और खेतों पर कब्जा कर लिया । गाँव के बाहर वह और उसकी माँ एक छोटी सी झोपड़ी मे एक गाय का दूध दही बेच कर गुजारा करते । कई दिन से उसकी माँ लगातार दही बेचती रही लेकिन अचानक आज तबियत खराब होने से वह नही जा सकी थी । आज उसकी माँ ने इससे कहा तो इसने मना कर दिया । क्रोधवश उसकी माँ ने इसे एक झापड़ मार दिया और वह रोता चिल्लाता मरने चला आया ।

    पक्षियों के कलरव से उसकी नीद टूटी और वह उठ बैठा , कुछ देर आँखें मलने के पश्चात वह अपने आप से बात करने लगा ।

    मैं नही जाउंगा …

    माँ ने मुझे मारा । आजतक तो नही मारा था , आज क्यो मारा ?

    कुछ क्षण वह चुप रहा फिर धीमी आवाज में बोला – दही चहिये … दही है दूँ … भैया दही लेना है !!… …

    वह सोच रहा था कि वह दही कैसे बेचेगा , क्या बोलेगा । दहीऽऽऽऽऽऽऽऽऽइ !! नहीं ये नही , लोग हसेंगे । वह खुद एक दही वाले पर हँसता था , जब दही वाला बोलता था – दहीऽऽऽऽऽऽऽऽइ तो वह अपने आंगन से चिल्लाता – खइबा त गाड़ बहीऽऽऽऽऽऽऽऽइ , और जोर से हँसता । माँ उसे मना भी करती लेकिन वह नही मानता ।

    आज वह इस सोच में डूबा था कि वह कैसे बोलकर दही बेचेगा । अचानक वह जोर से बोल उठा – दही होऽऽऽऽऽऽऽऽऽओ , उसकी यह आवाज उस वीरान में गूंज उठी और वह हँस पड़ा ।

    आखिर माँ कैसे दही बेचती होगी ? एकाएक उसके दिमाग मे यह प्रश्न उठा । उसने कुछ शब्द भी सोचे कि शायद ऐसे कहती होंगी और धीमी आवाज मे उसे उच्चारित करने लगा ।

    उसने कई बार फेरी वालों को देखा था । चीखते चिल्लाते फेरी वाले , तरह तरह की आवाजें निकालते फेरी वाले जिन्हे वह आश्चर्य से देखता था और कई बार उन पर हँसा भी था ।

    उसने सोचा- क्या लोग मेरी माँ पर भी हँसते होंगे ?

    अचानक उसकी साँसें तेज चलने लगी , शरीर मे अजीब सा कंपन होने लगा और नथुने फूलने लगे । उसने अपनी मुठ्ठी भींच ली और दाँत पीसता तेजी से गाँव की तरफ़ दौड़ पड़ा ।

              उसी धूल भरे रास्ते से होते हुए …