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    November 20

    रूके रूके से कदम……… आइये चल फिर लेते हैं… थोड़ा अगाड़ी, थोड़ा पिछाड़ी.

    चलना सीख जाने के बाद

    चलना कितना आसान काम लगता है

    जैसे हमेशा से ही हम इसे जानते रहे हों

    पहली बार पांव चलने की स्मृति किसी के पास नही होती

    मां नानी या बहनों से सुने किस्सों से ही हम जान पाते हैं

    कि कितने दिनों तक हम घुटने ही चलते रहे

    कि पहली – पहली बार किसकी उंगली पकड़ कर

    हमने कितने डगमगाते हुए रखा था एक – एक कदम

    चलने की कोशिश में कितनी बार गिरे और रोये थे

    दीवार के सहारे खड़ा कर दिया था

    बगल की मुंहबोली मौसी ने

    और अचानक ही हम चलने लगे थे

    खुशी से भर गया था घर और औंधे मुँह गिरने से पहले ही

    माँ ने लौक लिया था हमें

    लकड़ी की तीन पहियों वाली वो गाड़ियाँ

    या प्लास्टिक और स्टील पाइप से बने वाकर देख कर भी

    कभी याद नही आता कि हमने भी कभी उनका

    उपयोग किया था

    पहली बार हमें चलते हुए देख कर

    कितनी खुश हुई थी माँ

    और कितनी चिंता से भर गयी थी

    दिन भर घर में गूँजता रहता था एक ही वाक्य

    देखना वो सीढ़ी की तरफ न चला जाये……

    देखना कहीं बाहर न निकल जाये सड़क पर………

    चलने के बारे में कितनी हिदायतें दी जाती थीं हमेशा

    अब कुछ भी याद नहीं

    जब कोई बूढ़ी औरत हमारे बचपन का किस्सा छेड़ देती है

    जब कोई बताता है कि कितनी मुश्किल से

    हमें सिखाया गया पाँव – पाँव चलना

    तो कभी विश्वास ही नही होता कि धरती कभी

    इतनी सख्त रही होगी हमारे पाँवो के नीचे

    एक बच्चे के पाँव चलने के कितने किस्से

    होते हैं हर एक घर में

    कि पहली बार घर से बाहर सड़क पर चलते हुए

    गोंदी में उठा लिये जाने को कैसे मचलने लगते थे हम

    कि किस तरह उँगली छोड़कर भागने लगते थे सड़क पर

    कि एक बार तो साइकिल से टकराते – टकराते बचे थे

    कि भाग कर अगर न पकड़ लिए जाते

    तो बस के नीचे ही आ गये होते

    कि चलते हुए हम चलने में ऐसे मगन हो जाते थे

    कि अपना संतुलन ही नहीं रख पाते थे

    हर कहीं टकरा जाते या औंधे मुँह गिर पड़ते

    कि हमने कई बार अपने घुटने फोड़े थे

    चलना सीख जाने के बाद

    चलना कितना आसान काम लगता है

    कभी याद ही नहीं आता कि किस तरह स्कूल जाते हुए

    हर दिन देहरी पार करने से पहले माँ कहती थी

    किनारे – किनारे सड़क के एक तरफ चलना

    अगल – बगल देखकर पार करना सड़क

    दुर्घटनाओं की खबरें पढ़ते हुए अक्सर सोचता हूँ

    कितनी कठिन जगह बनती जा रही है धरती

    दिनों दिन एक पैदल चलते आदमी के लिए

    पहली बार घर से बाहर जाते समय

    मुझे हिदायतें देते हुए जितनी डरी होगी माँ

    उससे कहीं ज्यादा आशंकाओं से भरे हुए हैं हम

    अपने बच्चों को सड़क पर चलने का

    कायदा समझाते हुए

     

    धरती पर पैदल चलता आदमी

    अब एक सम्मानजनक दृश्य नहीं रहा।