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    October 24

    गये थे सज धज कर, लौटे फटी जांघिया में

     

    अभी कुछ दिन पहले हमारे एक मित्र अपनी अनदेखी प्रेमिका की शादी में शामिल होने गये थे। आजकल क्या है कि संचार माध्यम के द्वारा भी प्रेम फल फूल रहा है, इसी में हमारे मित्र भी अटक गये। अटकना स्वाभाविक ही है उमर भी तो वही है। 16 बरस की बाली उमर…

    पिछले एक वर्ष से ये ज़नाब हर रोज शाम को 100 रुपये का टाक वैल्यू अपने फोन में डालते और रात भर न जाने क्या क्या बतियाते और सुबह से दोपहर तक बाकायदा चद्दर तान कर सोते। रोज की यही स्थिति थी, कालेज का एक दो क्लास ज़रूर मिस हो जाता लेकिन वहाँ भी प्राक्सी सुविधा के चलते इन्हें सुकून था।

    दशहरा की छुट्टियाँ थीं। ये भाई फोन से चिपके हुए थे कि अनदेखी प्रेमिका ने अपनी बहन की शादी में आने का न्योता इन्हें दे डाला। दीदार की चाहत में इन्हें और कुछ नहीं सूझा फटाफट तैयारी कर ली।

    इन्हें यूँ तैयार होते देख इनके पड़ोस के मित्र भी ललचायी आँखों से देखे और बोले – अंकित! टूर पर जा रहे हो?

    अंकित – मत पूछिये, एडवेंचरस घूमाई घूमने जा रहे हैं। आप भी चलेंगे?

    उनके मित्र - हाँ यार क्यों नही! कब तक लौटना होगा?

    अंकित – कल सुबह तक…

    फिर वे भी जोशिया गये। फटाफट दौड़ते हुए अन्दर गये और परफ्यूम छिड़कने लगे।

    कुछ ही देर बाद दोनों शूर वीर शर्ट खोंस कर, पैरों में नये जूते बाँधे और कंधे पर कोट लटकाये अपने गंतव्य की तरफ रवाना हुए। जो कि 60 किमी दूर था, जाते जाते शाम हो गयी थी।

    अब ये उनकी नियति थी या सौभाग्य था की जिस गाँव की बात उनकी प्रेमिका ने किया था उस नाम के तीन गाँव 15 किमी के दायरे में स्थित थे। जो कि चित्रकूट क्षेत्र से लगा था।

    पहले पहल तो ये बिना जाने समझे एक व्यक्ति से उस नाम के गाँव की लोकेशन पता कर ली और पैदल ही निकल लिये जो कि मुख्य सड़क से 7 किमी दूर था।

    पैदल चलते चलते रात के 8 बज गये कि तभी गाँव से दूर एक जोरदार रोशनी इन्हें नज़र आयी। इन्हें लगा कि शादी वाला तम्बू वही है। रास्ते में मिले एक व्यक्ति से उन्होंने पूछा – भाई साहब वो जो दूर तम्बू लगा है वो किसका है और उनका घर कहाँ है? लेकिन राहगीर को कुछ समझ में नही आया कि ये क्या कह रहे हैं।..........................

    यह सोचकर कि इस समय बाराती रसगुल्ले, गुलाबजामुन गपक रहे होंगे, ये दोनों द्रुत गति से उस तरफ दौड़ पड़े।

    करीब जाकर देखा तो रामलीला हो रही थी। राम – रावण युद्ध चल रहा था और रावण जोरदार हँसी हँस रहा था, मानो इन्ही बेवकूफों पर हँस रहा हो।

    इन्हें सूटबूट में लिपटा देख रामलीला कमेटी वाले इनकी तरफ दौड़ पड़े कि शायद कोई गणमान्य अतिथि आये हों।

    रावण और राम भी युद्ध करना छोड़कर इन दो नमूनों को देखने लगे कि देखें तो कौन सूटबूटधारी आया है जो हमारी कला से खुश होकर 500-500 का नोट देगा। इन दोनों सज्जनों को अपनी ओर देखते हुए रावण खुश होकर जोर जोर से हँसने लगा मानो ये राम को चिढ़ा रहा है कि वो 500 मुझे मिलने वाले हैं।

    मुफ्त में मिली इज्जत बचाने हेतु 200 रुपये इनकी जेब से निकले और राम रावण पर न्यौछावर हो गये।

    कुछ देर तक वे दोनों रामलीला में लगी ए-क्लास कुर्सी पर बैठ कर विचार करते रहे कि अब क्या किया जाय।

    दोस्त ने कहा – यार, आज रात रामलीला में गुजार दो कल सुबह जायेंगे।

    अंकित – अबे! रामलीला खतम होने वाली है, सब अपने अपने घर जायेंगे तो तू इस सीवान में बैठकर भूतों का भांगड़ा देखेगा?

    कुछ देर तक अतिथि बनकर बैठे रहे फिर चल दिये, लोग इनके सम्मान में जमीन से उठ कर खड़े हो गये।

    सभी जानते हैं चित्रकूट क्षेत्र डाकुओं का इलाका है, लेकिन ये बेवकूफ़ नही समझे। सीता खोज में निकले ये दोनों पगले रात में वो गाँव ढूँढ रहे थे जिसमें शादी हो।

    एक सुनसान रास्ते में, जो कि चारों तरफ घनें पेड़ों से घिरा था, इन्हें कुछ लोग दिखाई दिये। ये उछलते हुए गाँव का पता पूछने के इरादे से उनके पास गये और बोले – भाई साहब आस पास कहीं कोई शादी है क्या?

    वे डाकू लोग थे।

    बस होना क्या था, सूट बूट देखकर उन लोगों ने इन्हें डरा धमका कर, चाकू और तमंचे सटाकर इनका सब उतार लिये। बस जांघिया छोड़ दी।

    किसी तरह ठिठुर कर इन लोगों ने रातें बितायी और भूख के कारण तड़पते रहे।

    सुबह हुई और कुछ ग्रामीणों ने इन्हें इस हाल में देखा तो समझे कि साले पीकर घूम रहे हैं। लेकिन इन सबने दुखड़ा रोया तो कुछ हृदयवान लोगों ने फटे पुराने कपड़े दिये और कुछ रुपये इस शर्त पर कि वापस आकर दे जाना।

    और दीदार के प्यासे बिना दीदार के लेकिन समझदार हो कर वापस लौटे।

    दूसरे दिन ये लोग गाँव वालों के द्वारा की गयी बेइज्जती उतारने, एक सभ्य नागरिक बनकर वापस उस गाँव गये और उधार लिये पैसे चुका दिये साथ ही वो फटे पुराने कपड़े भी……

    बाद में उन्होनें ये आप बीती मुझे सुनायी। ज़वाब में मैने कहा – चलो अच्छा हुआ कि तुम्हारे द्वारा दान किये गये 200 रुपये पुण्य में गये बाकी तो डाकू ले गये।

    रामलीला में अपनी इज्जत बचाने के लिये तुमने दान किया और तुम्हारी इज्जत बच गयी।मुफ्त में जान भी बच गयी। ज्यादातर तो हत्या करके ससुरे लूटते हैं ताकि किसी को पता न चले।

    शायद वही दान, गाँव वालों की मदद के रूप में तुम लोगों को मिला। वरना आजकल कौन, किसको पूछता है?

    मेरी बातें सुनकर वे अपने इस कृत्य पर मुस्कुराने लगे।

    October 22

    एक छोटा सा चुटकुला .....

    एक बार अटल बिहारी , मुशर्रफ , मल्लिका शेरावत और मार्गरेट थेचर , एक साथ ट्रेन में सफर कर रहे थे। ट्रेन एक सुरंग के अंदर से गुजरी , घना अंधेरा छा गया। अटल को पता नही क्या सूझी , उसने अपने हाथ को चूमकर एक जोरदार आवाज निकाली और एक जोरदार झापड़ मुशर्रफ के रसीद कर दिया। सभी ने झापड़ की आवाज़ को सुना। ट्रेन जब सुरंग से बाहर निकली , सबने देखा , मुशर्रफ अपने गाल को सहला रहा था , सभी ने अलग अलग सोचा :

    मुशर्रफ सोच रहा था : अटल ने मल्लिका को किस किया होगा , गलती से झापड़ मुझे पड़ गया।

    मल्लिका सोच रही थी : हो सकता है मुशर्रफ ने मेरे को किस करने के चक्कर मे मार्गरेट थैचर को किस कर दिया हो इसलिए पिटा।

    मार्गरेट सोच रही थीं : ये मुशर्रफ भी ना , गलत जगह हाथ डाल देता है , मुझे किस करता तो , कम से कम , झापड़ तो ना पड़ता ।


    अटल सोच रहे थे : अगली बार सुरंग आएगी तो फिर से करूंगा।

    October 21

    भीड़ में अपना चेहरा दिखाना चाहते हो तो पुकारो अश्लील, अश्लील!!!

     

    हाँ जी! अभी कुछ दिन पहले अमेरिका में इस मुद्दे पर शोध हुआ जिसके नतीजे चौकने वाले रहे। अगर आप भीड़ में उपेक्षित हैं तो बस चिल्ला भर दीजिये – अश्लील, अश्लील……, मेरे घर में अश्लील, मुहल्ले में अश्लील, पड़ोस में अश्लील, ब्लाग में अश्लील, पूरी दुनिया में अश्लील………

    तुरन्त ही आप महसूस करेंगे कि भीड़ आप की ओर मुड़ जायेगी। लेकिन शर्त यह है कि अश्लील कायदे का हो।

    यहाँ हम अपने स्तर से नीचे जाने में सकुचा रहे हैं इसलिये ‘अश्लील’ को अश्लील कह रहे हैं। दरअसल ‘अश्लील’ शब्द, उन शब्दों और वाकयों का निचोड़ है जो कि समाज में खुले आम प्रतिबन्धित हैं। चोरी छिपे या अनुसाशन से करो तो वही शब्द और घटनायें शील हैं, मधुर हैं।

    तो अश्लील माने क्या होता है? सब जानते हैं, यहाँ परिभाषा बनाने हम नही बैठे हैं। हम तो शोध पत्र जारी करने बैठे है जो सीधे अमेरिका से फैक्स के माध्यम से हमारे पास आया।

    शोध पत्र की भाषा कठिन है। इसलिये शार्ट में समझाते हैं,

    जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हम सभी सुंदर वन के प्राणी है। प्राणी हैं इसलिये चीखते भी हैं चिल्लाते भी हैं, मौका मिले तो गाली भी देते हैं।

    सुंदर वन की खास बात है कि जो कहना है कह भर दो, कोई नियम कानून नही है। इसी कहने के चक्कर में मार हो जाती है, सिर फोड़ौउअल का खेल चल पड़ता है,

    दूसरी तरफ शांति की बात होती है, मन की शांति, तन की शांति…

    जब सारी बातें हो जाती हैं तो दिमाग सोचता है कि अब नया क्या? हमने शील की बात कर ली, काफी अच्छे अच्छे लेख लिख डाले, कविता, गज़ल, कहानी सब तो ठूँस दिया सुंदर वन में अब क्या करें? अब तो हालत यह हो गयी है कि कोई पूछता भी नहीं।

    बस यही से हमारी असली मानवता नज़र आने लगती है, हम उस मुद्दे की तरफ जाते हैं जो समाज मे रहकर देखना भी पसन्द नही करते, परन्तु अकेले देखने को मिल जाय तो क्या कहने…… अरे भाई वही……!! अश्लीलता… भिन्न प्रकार की अश्लीलता…

    उम्र बीत गयी लेकिन ऐसे शब्द लिखे हुए हमने नही देखे केवल सुने थे लेकिन सुंदर वन की महिमा के चलते उसे लिखा हुआ भी देख लिये…और लिखने वाले कौन? उम्र में हमसे चार गुना बड़े भाई साहब!! और लिखने का कारण? उनको भीड़ चाहिये। भीड़ जुटाने के चक्कर में वो हमें अश्लील शब्द पढ़वाते है कि देखो उसने ऐसा कहा और अपने को साफ जताते हुए वो उस अश्लील को जी भर गालियाँ दे डालते हैं कि समाज में खुले आम अश्लील काम करते हो और भीड़ उनके इस प्रयास की कोटि कोटि प्रशंसा करती है, आखिर भीड़ को भी तो भीड़ चाहिये।

    भीड़ तो मानव भावनाओं से महिमा मंडित है जहाँ अश्लील और सेक्स की बात होती है उधर अपने आप मुड़ जाती है।

    इसका भी एक कारण है, सेक्स और अश्लीलता विषय ही ऐसा है कि देख लिया, सुन लिया तो मन में गुदगुदी सी होने लगती है। यह तो मानव की प्रमुख कमजोरी है।

    इस कमजोरी को एक विशेष मनोवैज्ञानिक तरीके से अपनाते हुए भीड़ को अपने काबू में किया जा सकता है।

    खुदा न करे कि ऐसा दिन आये जब सुंदर वन के प्राणी जो कि जल्द ही दाखिला लिये हैं वे भी गलियों चौराहों और ऐसी जगहों पर जाये जहाँ अश्लील दिखता है, अश्लील बिकता है और वही से हमारे लिये भी ढेर सारी अश्लीलता बटोर लाये और बोलें – लीजिये सर! आपके लिये फ्री गिफ्ट है।

    कितने अच्छे विचार से इस सुंदर वन का निर्माण हुआ होगा कि सब पढ़े, सब बढ़े।

    लेकिन आज जो आगे बढ़ रहा है उनकी टाँग पकड़ कर सब लटक गये हैं।

    न खाइब न खाये देब!

    इस समय हम अपनी पसन्द के फल सुंदर वन से चुन चुन कर खा रहे हैं।

    खाते समय गन्दगी का जिक्र नही करते लेकिन गन्दगी का अस्तित्व तो होता ही है, सब जानते हैं। आखिर, खाते समय गन्दगी की बात छेड़कर आप क्या साबित करना चाहते हैं, कि फलां जगह इस टाइप की गन्दगी है!!?

    लेकिन आजकल की साइकॉलॉजी समझ पाना कठिन हैं। लेकिन हमने कोशिश की और अमेरिका वालों ने भी की, इस साइकॉलॉजी को समझने की !!

    सीधी साधी साइकॉलॉजी है कि सुंदर वन की साइकॉलॉजी दूषित हो रही है। सभी साइकॉलॉजी के पीछे एक साइकॉलॉजी है और उसके पीछे दूसरी।

    इसे इस तरह से समझा जा सकता है –

    1) जैसे एक प्राणी ने कुछ अश्लील शब्द आपको समर्पित किये और बोले कि ये अश्लील है, इसे रोका जाना चहिये। इसमें भीड़ जुटाने की साइकॉलॉजी है और ये दिखने की कि हम साफ पाक हैं।

    2) दूसरी साइकॉलॉजी यह है कि वह ढेर सारी वाह वाही पायेगा कि क्या बात है, गन्दगी विचारणीय है और साथ ही वह इन्तजार करता है कि कोई आगे आये और मुझे डाँटे कि अश्लील शब्द क्यों लिखे हो।

    3) अगर कोई ऐसा नही करता तो वह खुद पर खुद एक अनजान शख्स बनकर एक टिप्पणी करता है और अपने आप को खूब कोसता है – “आपको खुद ऐसा नही लिखना चाहिये।“

    4) इसमें यह साइकॉलॉजी है कि और लोग आये और टिप्पणियों से डाँटे ताकि प्राणी पापुलर हो जाये जिससे प्राणी के बारे में भी लोग लिखें कि कितना बेहूदा है।

    5) अच्छे बनकर भीड़ में खो गये इससे अच्छा है कि ऐसे ही दिख कर लोगों के सामने बने रहे, बाद में सफाई भी दे देंगे।

    6) भीड़ को भूलने की आदत है, कुछ दिन में भूल जायेगी। प्राणी अब भक्तिमय रचनाये लिखेगा और अनन्य भक्त के रूप में स्थापित हो जायेगा।

    7) अगर इसके बवजूद भीड़ नहीं आयी तो पापुलर लोगों पर गालियों की बौछार करता है और उनकी टाँग पकड़कर खींचता है कि उसी के बहाने हम सामने तो रहे। बाल की खाल निकालने से भी नही चूकता।

    8) और भी ढेर सारी मलिन साइकॉलॉजी…………

    तो बाबूजी हमने देख लिया सुंदर वन की गरिमा। ये भी माया का एक जाल है। इस मायाजाल से हम बहुत दूर थे तथा किसी और वन में मस्त होकर जीवन यापन कर रहे थे। एक दिन बड़े भाई साहब ने सुंदर वन की महिमा बताई और हम चले आये………… अब जब आ ही गये हैं तो मेरी साइकॉलॉजी ने भी पलटी मारी होगी।

    मैने भी यह अश्लील पुराण एक दूषित साइकॉलॉजी के चलते लिखा है…………… इसमें कोई शक नही है।

    पहले तो सोचते थे कि कितना हसीन सुंदर वन है तरह तरह के फल हैं लेकिन मुझे क्या पता था कि सारे फल बिकते भी हैंअब जब फल मंडी खोल ही ली है तो शोरगुल तो होगा ही, ग्राहक पकड़ने के लिये।

    लेकिन कुछ ऐसे भी है जो फल दान करने आते हैं।

    इसकी मुझे खुशी है।

    October 20

    नीम की पत्तियाँ : लघुकथा

     

    एक छोटा सा गाँव था। उसमें माधव नामक एक बुजुर्ग अपने बेटे सुधीर और बहू लक्ष्मी के साथ रहता था। उसकी बहू बहुत सीधी और समझदार थी जबकि उसका बेटा कुछ अकड़बाज था। दोनों की कुछ साल पहले शादी हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद लक्ष्मी ने घर के सामने एक नीम का पौधा लगाया। वह प्रकृति प्रेमी थी और साथ ही एक सधी विचार वाली गृहणी भी। उसका विचार था कि नीम के पौधे से घर की हवा कीटाणु रहित और स्वच्छ बनी रहेगी।

     

     

    नीम का छोटा पौधा अच्छी मिट्टी और लक्ष्मी जैसा संरक्षक पाकर लहलहाते हुए बड़ा होने लगा, लेकिन कभी कभी उस छोटे पेड़ की सुकोमल शाखा को सुधीर तोड़ कर दातुन करने लगता। लक्ष्मी ने उसे बहुत समझाया कि अभी दातुन के लिये नीम से शाखायें न तोड़ा करे क्योंकि अभी यह विकसित हो रहा है, परन्तु सुधीर लक्ष्मी को डांट कर चुप करा देता।

     

     

    अपने आप को कटता, छिलता नीम का पेड़ दुखी होता लेकिन लक्ष्मी का स्नेह देखकर सब कुछ भूल जाता और अपना सिर आसमान की ओर किये उसकी तरफ निरन्तर बढ़ता जाता। नीम के पौधे को इस तरह बढ़ता देख लक्ष्मी फूली न समाती।

     

     

    एक दिन माधव के पास उसका पड़ोसी आया और उससे नीम की कुछ लकड़ियाँ मागने लगा। माधव ने उसे लकड़ियाँ काटने की छूट दे दी। लक्ष्मी उस समय खेतों में काम कर रही थी, जब तक वह वापस लौटती तब तक पड़ोसी ने नीम की दुर्गति बना दी।

     

     

    नीम की ऐसी दशा देख लक्ष्मी रो पड़ी और अपने ससुर माधव से रुष्ट हो गयी और बहस कर ली। ज़वाब में उसके ससुर ने कहा कि घर उसका है नीम का पेड़ उसके घर में है वह नीम के साथ चाहे जो करे, वह बोलने वाली कौन होती है। शाम को सुधीर वापस आया, अपने पिता से लक्ष्मी के खिलाफ बातें सुनते ही घर में घुसकर काम कर रही लक्ष्मी को मारने पीटने लगा। यह देख नीम का पेड़ पीड़ा से कराह उठा। स्वयं कटने की पीड़ा उतनी कष्टदायक नही थी।

     

     

    नीम की देखभाल के चलते लक्ष्मी कई बार अपमानित हुई। उसने यह निश्चय किया कि अब से वह नीम की कोई रखवाली नही करेगी। जिसको जो चाहे सो करे, काटे पीटे, तोड़े मरोड़े चाहे जो करे अब वह किसी को उलाहना नही देगी।

     

     

    पतझड़ का मौसम आया और नीम की पत्तियाँ जमीन पर गिरने लगीं। नीम की इन पत्तियों को देख माधव बिफर पड़ता और लक्ष्मी से पत्तियाँ बटोरने को कहता। लक्ष्मी - कहती घर आपका है नीम भी आपका है, आप ही नीम के मालिक हैं मैं कौन होती हूँ!!

     

     

    लक्ष्मी के इस व्यंग्य से माधव चिढ़ जाता और कहता – ‘नीम कटवा कर फेकवा दूंगा’। फिर वह सुधीर से पत्तियाँ साफ करने को कहता। सुधीर बेमन से पत्तियाँ बटोरने लगता और नीम के पेड़ को कोसता।

     

     

    घर में उपजे इस तनाव और ईर्ष्या के कारण नीम के पेड़ का विकास रूक गया और वह दुर्बल होता चला गया। पतझड़ समाप्त होते होते वह सूख कर मात्र एक ठूंठ रह गया। कुछ दिन बाद माधव ने उस नीम के पेड़ को कटवा दिया। लक्ष्मी उस दिन बहुत रोई थी। अब नीम का पेड़ नहीं रहा।

     

     

    कुछ महीने गुजर जाने के बाद माधव को चोट लगने से एक बड़ा घाव हो गया। डाक्टर ने कुछ दवाईयाँ दी साथ ही नीम की पत्ती से घाव साफ करने की हिदायत भी दी। माधव ने नीम की पत्ती गाँव में खोजनी शुरु कर दी लेकिन कही भी नीम का पेड़ नही दिखा। नीम की पत्तियों से घाव न धुलने के कारण घाव और बड़ा होता जा रहा था।

     

     

    एक दिन सुधीर के साथ माधव दूसरे गाँव में जाकर वह नीम की पत्तियाँ खोजने लगा। एक घर के सामने नीम का पेड़ दिखा और माधव ने बिना घर के मालिक से पूछे सुधीर को नीम के पेड़ पर चढ़ा दिया। सुधीर नीम की पत्तियाँ तोड़ तोड़ कर नीचे गिरा रहा था कि अचानक गृहस्वामी ने देख लिया और लाठी लेकर दौड़ पड़ा।

     

     

    उसे ऐसे आते देख माधव की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी, घाव के चलते वह भाग भी न सका कि एक लाठी उसके सिर पर आ पड़ी। माधव एक ही लाठी में चित्त हो गया। सुधीर डर के मारे पेड़ पर ही बैठा रहा लेकिन घर के और सदस्यों ने मिट्टी का गोला फेक फेक कर उसे नीचे गिरा दिया फिर जम कर धुनाई की। उन लोगों ने मार मार कर दोनों की हड्डी पसली एक कर दी। फिर इस तरफ न दिखने की चेतावनी देकर उन्हें छोड़ दिया गया।

     

     

    वे रोते कराहते घर आये। लक्ष्मी उनकी यह दुर्दशा देख जल्दी से घावों पर मरहम पट्टी की। उनकी पूरी बात सुनने के बाद उसने एक गहरी साँस ली और आँख में आँसू लाते हुए उसने कटे हुए नीम के जड़ वाले हिस्से को देखा और बोली – ‘काश अपना नीम होता!!!’

     

     

    माधव के मुँह से रूंआसा सा स्वर निकला – ‘तो नीम की पत्तियाँ भी होती!’

                                ****************

     

     

    और हम कहते है कि ससुरे यूँ लात न खाते और न ही लतियाये जाते। :)

     

    (आंशिक सत्य घटना पर आधारित)

     

     

    नोट - इस लघुकथा से क्या शिक्षा मिलती है? इस प्रश्न को लेकर मैं असमंजस में हूँ। पता नही शिक्षा मिलती भी है या नहीं!!

    October 18

    मैडम जी चोट नही लगी …

                                friends

        मेरे घर के ठीक बगल में स्थित स्कूल की खिड़की खुली थी। जहाँ से शोर का शोरबा रिस कर मेरे कानों तक पहुँच रहा था। मैं बच्चों की अटखेलियाँ देखने अपने छत पर आ पहुँचा। छत से खिड़की काफी करीब थी। नजदीक जा कर देखा, कक्षा सात या आठ के विद्यार्थी अपनी कक्षा में मदमस्त होकर उछ्ल कूद कर रहे थे, कुछ झगड़ रहे थे और कुछ बाकायदा हाथ घुमा घुमा कर बोल बतिया रहे थे।

       

          अचानक ही उनके इस कार्य को ग्रहण लग गया और चहु ओर शान्ति स्थापित हो गयी। शायद कोई अध्यापक आ रहा था। मैं वापस लौटा कि कौन भयावह टीचरों का चेहरा देखे, उम्र भर तो देख देख कर पिटते और सुबकते रहे हैं और वैसे भी मास्साब शब्द सुनते ही दिल बैठने लगता है, दिमाग में प्रतिकृति उभर आती है एक मोटे मानव की जिसकी रावण जैसी आवाज़ थी और हँसी तो ऐसी मानो हमें ही डांट रहा है। अध्यापकों से डर का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब कभी मास्साब बाजार में दिख जाते तो हम भीड़ में छिप जाते कि कहीं देख न ले और अगर गाँव की पगडण्डियों पर दूर से ही आते दिख जाते तो हम रास्ते से खेतों में उतर कर पैंट की जिप खोल लेते और पेशाब करने का नाटक करते। उनके करीब आते आते तो पेशाब हो ही जाती, या फिर इस डर से हो जाती कि अभी खड़े देख लेगा तो कल बुरी हालत बनायेगा। उनके गुजर जाने (रास्ते से) के बाद हम वापस रास्ते पर आते और बिना पीछे मुड़े, सरपट घर की तरफ भागते।

     

     

          बच्चे खड़े होकर अभिवादन किये – “गुड मार्निंग मैडम”। मैडम शब्द सुनकर पाँव ठिठके। हमारे अन्दर पल भर के लिये समाये डर का वजूद नही रहा और शान से वापस पलटे। पलटते ही मैडम जी के उपर निगाह पड़ी, जिस तेजी और शान से वापस मुड़े थे उसी तेजी से मुझे फिर से वापस मुड़ जाना पड़ा। चाल में तेजी लाते हुए हम छत के उस छोर पर चले गये जहाँ से खिड़की नहीं दिखती।

     

     

       दरअसल बात ये हुई कि ये जो बच्चों की मैडम थी ये कक्षा दो से पाँच तक की मेरी सहपाठिनी थीं। जाहिर है उस समय की हुई कुछ हरकतों से इस उमर में शरम तो होगी ही। कैसी कैसी बचकानी हरकतें होती थीं उस दौरान, याद आते ही चेहरे पर मुस्कान दौड़ जाती है। उस दौर के हम आंशिक प्रतिद्वंद्वी थे वो सभी विषयों की माहिर थी और हम निठल्ले केवल गणित के…………, जब कभी वो गणित में मुझसे ज्यादा अंक पाती तो जीभ निकालकर, अंगूठा दिखाकर मेरा अभिवादन करती और जब मेरी बारी आती तो मैं अपना मुँह खोलकर उसे अपने सारे दाँत दिखा देता। जो कुल मिलाकर तेरह थे, बाकी खेलकूद, लड़ाई झगड़े, साइकिल से गिरकर तोड़ लिये थे। जिसमे से एक सामने वाला दाँत चाकलेट ठूँसने से खराब हो गया था। गलती से अगर वह उसे दिख जाता तो वह मुझे चिढ़ा चिढ़ा कर मेरा कान खा जाती। जिस दिन उस दाँत के टूटने का समय आया मैं प्रफुल्लित हो गया कि अब मेरा खराब वाला दाँत टूट जायेगा लेकिन मुसीबत जल्दी नहीं जाती। दो हफ़्ते तक वह दाँत डुगुर डुगुर हिलता रहा लेकिन कम्बख्त टूटता ही नही था। अगले दिन इन मैडम के द्वारा किये गये उपहास से हम क्रोध में आये और सिल बट्टे का बट्टा उठाया और अपने हिलते दाँत पर दे मारा। वह दाँत तो टूट गया लेकिन बगल वाला दर्द के साथ हिलने लगा लेकिन उस दाँत के जाने की खुशी के सामने दर्द छोटा लगने लगा था।

     

     

        बट्टे को मुँह पर मारते हुए बड़ी दीदी ने देख लिया था और स्कूल जाकर सबको बता दिया। यहाँ तक कि उस मुसटंडे मास्साब को भी……। अपनी कक्षा में मास्साब ने मुझे खड़ा कराया और मजे लेकर पूछे – “क्या बेटा !, दाँत तोड़ने के लिये कोई और औजार नही मिला क्या?” फिर तो जग हँसाई हुई कि रामचन्द्र का बेटा बट्टे से दाँत तोड़ता है।

     

     

         इन मैडम जी की लाटरी निकल पड़ी थी जब मौका मिले अपने दाँतों पर कलम ठोंककर चिढ़ा देती। उसके दाँत मोतियों जैसे थे सो दाँतों को लेकर मैं उसे चिढ़ा भी नही पाता लेकिन वह अपनी आदत से बाज़ नही आई जब तक कि पूरी तरह से दाँत निकल नहीं आया।

     

       लेकिन अब वो दिन लद गये। आज पूरे 30 चमचमाते दाँतों का मालिक हूँ बाकी के दो पेंडिंग में हैं।

     

        एक दिन वह अपनी दीदी के साथ मेरे घर आयी। मेरी और उसकी दीदी सहेलियाँ थीं। मेरे पास ताबें के पुराने सिक्कों का अच्छा खासा संग्रह था। जो मेरे लिये प्राणप्रिय था। उस समय मैं उन सिक्कों के साथ खेल रहा था। उसने सिक्कों पर अपनी नज़रें गड़ा दी थीं। उसे ऐसे देखता देख मैनें सिक्कों को समेटा और बाहर निकल गया।

     

       दूसरे दिन कक्षा में दो ताँबे के सिक्के दिखाकर वह मुझे चिढ़ाने लगी। मुझे लगा कि मेरा सिक्का उसने ले लिया है। मैं क्रोधित हो गया। उस समय मास्साब कुछ पढ़ा रहे थे, मैने आव न देखा ताव, झपट पड़ा। उसके बाल खींचकर दो झापड़ लगाये और धक्के देते हुए सिक्के छीन लिये। वह ज़मीन पर गिर पड़ी थी। अचानक हुए इस घटनाक्रम से मास्साब क्रोधित हो गये और मुझ पर डंडे की बारिश करने लगे। कितनी बार उन्होनें सिक्का वापस करने को कहा लेकिन प्रिय चीजें आसानी से नहीं दी जातीं और न ही मैनें वापस किये। मास्साब ने इस ढिठाई के लिये पिताजी से शिकायत करने की चेतावनी दी लेकिन कुछ असर नही हुआ। मास्साब ने उसे समझा बुझा कर चुप करा दिया।

     

        सिक्के लेकर मैं घर आया और डिब्बे खोलकर अपने सिक्के गिनने लगे। परन्तु यह क्या मेरे सिक्के तो पूरे हैं फिर ये किसके हैं हूबहू मेरे सिक्को जैसे!! मैं सोच में पड़ गया। इतने में स्कूल से लौटीं दीदी ने आकर एक चपत लगाई और बोलीं – घर आये सहपाठी के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं जैसा तुमने उस दिन किया??? और तो और दूसरे का सिक्का छींनकर शेर बनते हो? वे सिक्के मैनें दिये थे उसे……। दीदी की आवाज तेज थी, आगबबूला होतीं दीदी उसके घर चली गयी। मैं अपराधियों की तरह सिक्कों के बीच पड़ा रहा।

     

     

       दूसरे दिन मैनें अपना सिक्कों से भरा डिब्बा उठाया और उसमें दोनों सिक्के डाल कर स्कूल चला गया। स्कूल आकर मै अपने यथा स्थान पर बैठ गया और उस तरफ देखा जिधर वह बैठती थी। लेकिन आज उसकी सीट खाली थी क्योंकि आज वह सबसे पीछे वाली सीट पर बैठी थी। मैं उस समय अपने आप से घृणा कर रहा था। उसके चिढ़ाने से मुझे लगता थ कि मैं कक्षा में हूँ लेकिन आज मैं कुछ अलग थलग पड़ा महसूस कर रहा था।

     

         भोजन अवकाश के समय सारे बच्चे अपना टिफिन खा कर बाहर खेलने चले गये और वह वही कोने में बैठी रही। मैं सिक्कों का डिब्बा लेकर सीधा उसके पास पहुँचा और उसके हाथों मे रख दिया। वह सरक कर एक कोने चली गयी और मुँह फेर लिया। उसने अभी अपना खाना खाया नहीं था। मैं उसकी टिफिन निकालकर खाने लगा। मेरे मुँह से चपर चपर की आवाज सुनते ही उसने नजर घुमाई और मुझे अपना टिफिन खाता देख वह लाल पीली होती मेरा टिफिन उठा लायी और खुद खाने लगी और उसकी जीभ बाहर निकली और अंगूठा उसकी खड़ी मुट्ठी पर नाच उठा। उसके यूँ चिढ़ाने से मुझे अपार खुशी हुई।

     

        छुट्टी के समय उसने सिक्कों का डिब्बा लौटाना चाहा लेकिन मैं उस डिब्बे को पहचानने से इन्कार कर दिया। जवाब में उसने कहा – अच्छा ठीक है, अपना हाथ तो दिखाओ…… कल ज्यादा चोट लगी थी ना !!! मास्साब काफी तेज तेज मार रहे थे … वो अच्छे नही हैं। इतना कहकर वह मेरा हाथ उलटने पलटने लगी। उसके इस व्यवहार ने मेरी आँखों मे पानी ला दिये। मानो मास्साब के डंडे की चोट से हुआ दर्द आज महसूस हो रहा है, और आँखें आँसू के रूप में उस दर्द को पिघला रही हैं। मैं कुछ न कह सका, बस उसके उन गालों को, जिस पर मैने थप्पड़ लगाया था, धीरे से सहलाकर रोता हुआ घर की तरफ दौड़ पड़ा।

      

        उस दिन मैनें भावों की अनुभूति की थी, साथ ही यह जाना था कि प्रेम अंतःस्थल में रहता है जिसे देखा नही जा सकता और यह भी जाना कि सिक्कों की भाँति स्नेह को गिना नही जा सकता। वास्तव में मैने असली सिक्के पा लिये थे। जिसे न कोई छीन सकता है न ही कोई चुरा सकता है।

    और दूसरे दिन से ही उसने अपना मोर्चा सँभाल लिया……………

     

    मुझे कभी कभी मास्साब भी चिढ़ाते – “क्या रे सिक्काचोर, गृहकार्य करके आया है?”

     

    कक्षा पाँच के बाद वह कहीं चली गयी। शायद उसके पिता जी का स्थानांतरण हो गया था।

     

    उन दिनों के बाद अचानक ऐसे दिख जाने से पहले पहल तो झेंप जाना स्वाभाविक है। मैं कुछ सोच कर वापस स्कूल की खिड़की तक पहुँचा। मैनें छिपकर, चोर निगाहों से उसे देखा। वह काफी खूबसूरत हो गयी है लेकिन बचपन में कुछ ज्यादा ही थी, दूध जैसे तो गाल ही थे और काजल से घिरी वो बड़ी आँखें ……। चेहरे में खास परिवर्तन नहीं आया। अभी विश्लेषण कर रहा था कि ………

     

    एक विचार उठा कि क्या मैं उसके सामने जाकर बीती बातें दोहराऊँ? क्या वे बातें उसके मन में आज भी उतनी ताजी होंगी? शायद गुजरते समय के साथ वह सब भूल गयी होगी और पहचानने से इन्कार कर दे………

     

    हो सकता है कि वो मुझे पहचाने और फीकी हँसी हँसे और पूछे – कैसे हो, कहाँ हो, क्या कर रहे हो? मैं उसे प्रश्नों के ज़वाब भर देता रहूँ …………

    मैं उसकी उन भोली यादों के साथ छेड़खानी बिल्कुल नही चाहता था। जैसा है वैसा रहने दिया जाय अब और कोई परिवर्तन नही।

    उससे मिलने की बात छोड़कर उसके क्रियाकलाप देखने लगा। वह हाथ में किताब लिये गणित पढ़ा रही थी ……… कुछ प्रश्न श्यामपट्ट पर लिख कर वह कुर्सी पर बैठ गयी।

    कि अचानक

    वह तुनक कर उठी और एक बच्चे को डांटते हुए बाहर बुलाया और कुछ पूछताछ करके छड़ी उठाई और उसके हाथों पर दो छड़ी लगाते हुए बोली जाओ बैठो लेकिन अब शरारत मत करना।

    वह बच्चा हँसने लगा। वह फ़िर गुस्साई और तेज आवाज में पूछी – क्यों हँस रहे हो? बच्चा बोला - मैडम जी चोट नही लगी ……

    October 17

    गूँजती चीत्कार … अन्तःस्थल के बीच …

     

           हम कौन हैं, क्या हैं, कहाँ हैं? कभी कभी दुनिया के शोरगुल के बीच ये प्रश्न हमारे जेहन में आ खड़े होते हैं। बाल्यावस्था, किशोरावस्था पार कर हम यहाँ तक आ पहुँचे हैं जहाँ हमारी महत्वाकांक्षाओं और अपनों की अपेक्षाओं के बोझ तले हमारा अस्तित्व चरमरा रहा है।

     

          हममें कुछ खास करने की चाहत है, हम कुछ खास बनना चहते हैं। पर किस तरह? इसका उत्तर बताने वाला कोई नहीं।

      

             माँ बाप हमें आसमान की बुलंदियों पर देखना चाहते है लेकिन हमारे दिल का हाल जानने के लिये उनके पास वक्त नहीं है। पढ़ाई या अन्य खरचों के लिये धन जुटा देना यही उनके लिये सब कुछ है। समय समय पर हमें चेताते और जताते भी रहते हैं कि मैनें तुम्हारे लिये क्या क्या नहीं किया। तुम्हारे लिये क्या सुविधाएँ और सहूलियतें जुटाईं। उनकी इन बातों के बोझ से उनके लाडले का मन कितना दबा जा रहा है, इसकी उन्हें खबर भी नहीं होती।

     

           हम उस दहलीज पर हैं जहाँ शरीर और मन में परिवर्तनों का दौर होता है। परिवर्तन आकृति में आते हैं और प्रकृति में भी। परिवर्तनों के साथ मन की चाहते भी बदलती रहती हैं। कल्पनाओं और आकांक्षाओं का नया संसार शुरु होता है। हम इसे बताना तो चाहते हैं पर कोई सुनने को तैयार ही नही होता।

     

          हाँ, बात बात में अपने माँ बाप से झिड़कियाँ ज़रूर सुनने को मिल जाती हैं। जैसे – अब तुम छोटे नही रहे बड़े हो गये हो, तुम्हें सोचना चाहिये, समझना चाहिये, कम से कम अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिये, बहुत खेल लिये अब तो सुधरो।

     

           ज़वाब में हम भी कुछ कहना चाहतें हैं परन्तु हमारी आवाज़ मन के कोनों में ही गूँज कर रह जाती है।

     

        इसी आयु में पढ़ाई और कैरियर की दिशा तय होती है। इंजीनियरी, डाक्टरी, प्रबंधन, कम्प्यूटर या अन्य कोई राह। इस दिशा एवं विषयों के चयन में बहुत कम माता पिता ऐसे होते हैं जो बेटे या बेटी की रुचि अथवा उसकी आंतरिक संभावनाओं का खयाल रखते हैं। प्राय: इस संबंध में अभिभावकों की दमित आकांक्षाएं ही उजागर होती हैं। फलाने का लड़का इन्जीनियर या डाक्टर बन गया तो इन्हें भी अपना लड़का इन्जीनियर या डाक्टर नज़र आता है। इसी आधार पर तय होता है कि क्या पढ़ना है और हम उनकी बात स्वीकार कर लेते हैं। आखिर उन्हीं के पैसों पर उनको ज़िन्दगी जो जीनी है।

     

         यहीं से शुरु होता है बेमेल जीवन का दर्द। रुचि, प्रकृति एवं संभावनाओं के विपरीत पढ़ाई का चयन कुंठा को जन्म देता है। मन का मेल न होने से इस पढ़ाई में स्वाभाविक रूप से कम अंक मिलते हैं।

     

         तब हमें सुननी पड़ती है अभिभावक से कड़ी फटकार। सुनने को मिलते हैं अपने नाकारा होने के किस्से। लगभग रोज ही प्राप्त होते हैं अपने निकम्मेपन के प्रमाणपत्र। बार बार की जाती है स्फल लोगो से तुलना। किसी गणितीय समीकरण की तरह यह विविध रूप से सिद्ध किया जाता है कि हम कितने गए-गुज़रे हैं।

     

         कभी कभी हमारे मन में अपने अभिभावक के प्रति गहरा डर समा जाता है जिससे हम उनसे कटते हैं कतराते हैं। साथ ही निराशा और चिंता मन में गहरी होती जाती है। मन चीखता है पर यह चीख अंदर ही रह जाती है। इस अवस्था में हम भावनात्मक रूप से अपने को बहुत अकेला पाते हैं। हमें तलाश होती है अपनेपन की। इसी तलाश का फायदा कुछ स्वार्थी जन अपने लाभ के लिये उठा लेते हैं तथा और भी गहरे गर्त में धकेल कर निकल लेते हैं।

     

          घर में हमारी खुद की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं रखता और विश्वविद्यालय में शिक्षा व्यवस्था का हमारी निजी ज़िन्दगी, स्वास्थय या हमारे मन की उलझनों से कोई मतलब नहीं होता। मरो चाहे जीयो लेकिन परीक्षा दो। कुछ कहने – बताने या जताने पर ताने – व्यंग्य या कटूक्तियों के कंटक ही हमारे पल्ले पड़ते हैं। आखिर मनोरोग और व्यवहारिक विकृतियॉ ऐसे ही तो पनपतीं हैं।

     

         वास्तव में माँ बाप के लिये हम वही पगलेठ बने रहते हैं जो पहले थे, समय के साथ हमारे अन्दर हुए भावनात्मक और मानसिक परिवर्तन उन्हें नहीं दिखते। हम खुद उनके सामने बच्चे ही बने रहते हैं, परन्तु ज़रा सा बड़े बनकर उनसे विपरीत बात की तो नसीहत दी जाती है कि बड़ों से कैसे बात की जाती है।

     

         हम वो युवा नहीं जो अपने यौवन को शराब में डुबोकर घुलाते हैं या सिगरेट के धुएं में उड़ाते हैं। हम अध्यात्मिक दृष्टि रखने वाले युवा हैं। यहाँ अध्यात्मिक दृष्टि का मतलब किसी पूजा पाठ, ग्रह शांति, अंगूठी, ताबीज, लाकेट या धर्म से नहीं है, इसका अर्थ तो जिन्दगी की सही और संपूर्ण समझ है। जिसके लिये हम प्रयासरत हैं।

     

         अभिभावक जिन्हें अपने स्वार्थ से मतलब है, वे हमारे लिये केवल पैसा जुटाते हैं। ज्यादा कुछ हुआ तो हमारी महत्वाकांक्षाओं के घास फूस में चिंगारी लगाते हैं। उन्हें अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, परिचितों से यह बताने में बेहद खुशी मिलती है कि उनका बेटा इंजीनियरी, डाक्टरी या प्रबंधन की पढ़ाई कर रहा है। पास होते ही बड़ी नौकरी लग जायेगी और कुबेर का खजाना लाकर घर में रख देगा। यदि काफी बातें हुईं तो बस जिम्मेदारी नैतिकता की एक घुट्टी पिला देते हैं।

     

          जो दोस्त हैं वे टाइमपास हैं,क्योंकि सभी अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं के घोड़ों पर सरपट दौड़ रहे हैं। बहुत अच्छी मुलाक़ातों के बावजूद किसी को किसी के मन में झाँकने की फुर्सत नहीं है। इससे अच्छी तो अन्तर्जाल की गोल दुनिया है जहाँ हम अपना समय गुजार लेते हैं और अपने मन के उद्गार लिख छोड़ते हैं। एक आध हैं जैसे – त्रिभुवन जी और सौरभ जी, जो कभी कभार इस विषय पर चर्चा कर लेते हैं बाकी सब अपनी दौड़ गिरते, सँभलते, रोते, गाते दौड़ रहे हैं। फिर भी चर्चा समाधान नही है।

     

         ज़िन्दगी अपेक्षाओं, आकांक्षाओं और जिम्मेदारियों के बोझ तले पिस रही है। मन की कोमल संवेदनाएं कुम्हला रही हैं।

     

         आदर्श की बात सभी करते हैं। माँ बाप, रिश्तेदार, शिक्षक और पुस्तकें, जो भी होता है आदर्शों की सीख देने से नहीं चूकता, परन्तु कहीं कोई यह बताने वाला नहीं है कि आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रक्रिया क्या हो।

     

          हमें कोई बताए तो सही कि हम उलझनों से कैसे बाहर निकलें। कोई हमें सुनने वाला तो हो। हमें तो बस डांटने, समझाने और नसीहत देने वाले मिलते हैं।

    October 16

    चाँद के पार चलो

                           moon

         खुला आसमान, जिस पर कुछ धूमिल तारे अपनी टिमटिमाहट से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, क्योंकि आज चाँद अपना पूरा लिबास पहन कर आया है और ये आकाश से गिरती अदृश्य ओस की बूँदें मुझे चेता रही हैं कि कुछ ओढ़ लो वरना सुबह तक ओढ़ लोगे। रजाई में लिपटे छींकोगे और गला फाड़ कर खांसोगे।

        आज कुछ ज्यादा ही धार्मिक स्थलों की सैर हो गयी। सुबह उठते ही भैरव बाबा, जो कि घर से 40 किमी दूर हैं, के दर्शन को चले गये थे उधर ही गुरु बाबा की पुण्यस्थली भी थी वहाँ भी चले गये। लौटते समय दीदी की ससुराल तक चले गये। नतीजन शाम तक हालत पंचर हो गयी थी। आज पूर्णिमा की मन भावन रात है और बाल्मीकि जी का हैप्पी बर्थडे भी है। मन में विचार आया कि सभी पुण्यात्मायें पूर्णिमा के दिन ही धरती पर अवतरित हुई है और एक हम पाप के सौदागर ठहरे जो सात दिन पहले ही टपक पड़े।

         पूनम की हसीन रात मधुर चाँदनी बिखेर रही थी। इस चाँदनी के चक्कर में मैं अपना बिस्तर छत पर उठा लाया था। चूँकि अभी तक अपने घर (आज़मगढ़) रहकर आराम फरमा रहा हूँ तो लाज़मी है कि बड़े मेरे इस हसीन विचार में अपनी टांग अड़ाये। नीचे से पिता जी की क्रूर आवाज आयी। जिसमें यह सन्देश था कि नीचे आकर निद्रा का आनंद उठाओ वरना वे उपर आकर मेरे आनंद में बाधा पहुँचायेंगे। पिता श्री की बातों से प्रेरित होकर माता जी ने भी आवाज लगाई – उपर हंडा गाड़े हो का? लेकिन आजकल पटाना हर किसी को आता है केवल मुझे छोड़कर। इस बात का पता मुझे आज ही चला हांलाकि शक पहले से ही था। जब मैनें अपने माता-पिता को समझाना चाहा तो वे और उखड़ गये।

         “चाँदनी लुत्फ़” के लिये विह्वल मन मुझे छोटे भाई तक खींच ले गया। मैने उसे अपनी इच्छा बताई तो उसने मेरे लिये माता पिता से बात की और आश्चर्य की बात ये रही कि माँ बाप मान गये लेकिन इस बात का तनिक भी आश्चर्य नही रहा कि छोटे ने कैसी-कैसी मन लुभावन बात माता पिता से कही। उसका ये पैदाइशी गुण है।

         नीचे वाली सदन में उपर आने का प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद मैनें आसन (बिस्तर) ग्रहण किया और उपर आसमान में लटक रहे चाँद पर अपनी आँखे गड़ा दी।

        ग्रामीण इलाका होने के कारण काफी शन्ति थी। पेड़ पर बैठे झींगुर अपना राग अलाप रहे थे, कुछ सियार और कुत्ते आपस में गाली गलौज किये जा रहे थे। सामने ही पुराना पीपल का पेड़ था, मेरे घर वालों का मानना था कि उस पर कुछ आत्मायें हैं जो रात में विचरण करती हैं। एक नज़र उसे भी देखा। डर पहले से हो तो ऐश्वर्य राय भी डरावनी दिखेगीं। किसी भूतनी की तरह्।

        राय साहब जो कि अब बच्चन साहब के मत्थे जड़ दी गयी हैं उनका ध्यान आते ही मुझे अपनी राय साहब याद आ गयी।

    हाय! क्या सूरत थी… और सीरत तो मुफ्त में मिली थी।

    कम्बख्त ! अगर पटाना सीख लिया होता तो कम से कम ये वेदना तो न होती। कितनी बार हरे सिगनल मिले परन्तु …

         पागल प्रेमी पूर्णतया वर्णान्धता के शिकार होते हैं, हरे और लाल में खास फर्क़ नही दिखता सो मुझे भी नही दिखा।

    लाल और हरा तो बहाना है, दम तो थी नही मजनू बनने की … संस्कारों की बेड़ियाँ, समाज में बने रहने की लालसा, इज्जत, और भी बाकी इसी टाइप की चीजें बहाना मारने के काम आती हैं कि अगर ये न होती तो जाकर बोल दिया होता ……

    लेकिन हक़ीकत कुछ और ही होती है।

    ओशो ने इस कुंठा को बाकायदा समझाया है। कुछ देर तक दूर स्थित सामने वाली खिड़की पर नज़रें गड़ाये इसी द्वंद में उलझा रहा।

        चाँद एक बार फिर सामने था और ओस की कोमल ठंडक मेरे चेहरे पर। चाँद की गोलाकार आकृति को देख कर ज्यामिति के कुछ प्रश्न जेहन में आ घुसे और दिख रहे चाँद की त्रिज्या की माप तौल शुरु हो गयी।

    अभी परिधि की माप आयी नहीं कि कहीं दूर जाते वाहन में बज रहे एक गीत के बोल कान में घुस गये

    चाँद के पार चलो …… चाँद के पार चलो ……

    दिमाग घूम गया। त्रिज्या दूर रह गयी और ताजा ताजा घुसे इस वाक्य की जाँच पड़ताल विश्लेषी दिमाग ने शुरु कर दिया।

    प्रश्न उठा कि –

    ऐं… !??!? चाँद के पार चलो ?!!

        श्रृंगार रस में इसकी क्या महत्ता? जो पागल प्रेमी जोड़े चाँद के पार जाने को आतुर हो गये। अभी तक आर जाने में नानी मरती है ये पार जा रहे हैं। फिर भी मैनें अपने दिमाग के डाटाबेस में इस फुटेज को डालकर सर्च मारा। दिमाग ने अपने पास रखी फाइलों को चेक किया लेकिन श्रृंगार रस से जुड़ी कोई भी साहित्यिक जानकारी नही मिली। तत्पश्चात् मैने एडवांस सर्च किया कि चाँद से जुड़ी हर एक फाइल बाहर ले आओ और धड़ाधड़ जानकारी मिलनी शुरू हो गयी। सर्वप्रथम हमारे नील भैया दाँत निपोरे साक्षात खड़े हो गये बोले चाँद पर सबसे पहले मैं उतरा। हम उनकी सूरत देखते आगे बढ़े और नवीनतम जानकारी उलटने पलटने लगे। एक फाइल में हमारे देश का प्रथम, डिब्बेनुमा आकार वाला, चन्द्रयान सुशोभित था जिसे दिखा कर नायर साहब उछल रहे थे। दूसरे हिस्से मे लिखा था कि कुछ वैज्ञानिक धरती के नीचे एक बड़े होल में बैठ कर ब्लैक होल बना रहे हैं, जिससे डरपोक टाइप के प्राणी चीख रहे हैं कि विनाश हो जायेगा, आकाशगंगा नष्ट हो जायेगी। हमने प्रोसेसिंग रोक कर ज़रा दम लिया और सोचा कि अच्छा हो अगर ऐसा हो सबको एक साथ परमधाम की प्राप्ति हो जायेगी। जनम मरण के चक्र से सब मुक्त हो जायेंगे। अभी यही तक आया कि प्रोसेसिंग फिर शुरु हुई और प्रतिउत्तर में ज़वाब मिला – “नही बेटा कुछ दिन पहले ताप वृद्धि के चलते परियोजना रोक दी गयी है” हम कहे – सत्यानाश हो इसका, लगता है कभी मुक्ति नही मिलेगी।

          विज्ञान रस में डूबे दिमाग को एक और विज्ञान मुहर लगी फाइल मिली। बचपन से यही बोझ लादे लादे घूम रहे हैं ऐसी फाइलें मिलना लाज़मी है। मैंने फाइल चेक की जिस पर ये मुद्रित था कि चाँद अपनी धुरी पर नही घूमता नतीजन चाँद के पार मतलब चाँद के दूसरे भाग में (जो हमें नही दिखता) सदा सर्वदा अंधेरा विराजमान रहता है।

    जानकारी पढ़कर चेहरे पर मुश्कान आई।

    अच्छा !! चाँद के पार हमेशा अन्धेरा होता है, मतलब ‘ससुरे’ अन्धेरे में जाने को कहते हैं और अन्धेरा कैसा जो कभी खत्म न हो।

    वाह ! वाह रे प्रेमी खोपड़ी, मान गये

    “जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि”

    ‘ससुरों का दिमाग तो देखो’, कैसी गहरी बात करते हैं। पगलेठ लोग तो बूझ ही नही पायेंगे वो तो सोचेंगे कि जाय सब कम से कम धरती का बोझ तो खत्म हो चाँद के इस पार जाय चाहे उस पार …

    “चाँद के पार” जाकर प्रेमी नामक जन्तु की बांछे खिल जायेंगी। कैसे कैसे कृत्य होंगे चाँद के पार जाकर … राम ही जाने … या हो सकता है कि वहाँ भूतों का राज हो जो इन्हें पकड़कर अपने सरदार गब्बर भाई के यहाँ ले जाये और बसन्ती का नाच गाना शुरु हो। खैर जो भी हो … वहाँ तो प्रेम की अविरल धारा बहती होगी।

        धारा तो धरती के पार्कों में भी बहती है, जो दिन दहाड़े चाँद के पार का लुत्फ देती है। पार्क की घनी झाड़ियाँ ही प्रेमी समुदाय का ‘चाँद का पार वाला’ हिस्सा है। जिसमे वे रमे होते हैं।

          जनता से मिली जानकारी के अनुसार … सुना है कि ट्रेनों में भी ये धारा बहा करती है। जिसे देख जनता का मन भी मचल जाता है कि वो भी एक बार चाँद के पार हो आये, लेकिन भौतिक और भौगोलिक कारणों से निराश होकर वे पहाड़ पार हो आये। जनता चतुर है।

          रात काफी हो चली थी। मैने फालतू घूम रहे दिमाग को नियंत्रित किया और राम का नाम लेकर सो गया। राम का नाम लेना ज़रूरी था, क्या पता पीपल वाला भूत रात में किसी दूसरे लोक की सैर करा दे। वहम ही सही, राम जी से प्रोटेक्शन लेने में क्या हिचकना …