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    January 07

    एक हकीकत

    एक हकीकत
                            
    कभी - कभी हम भीड़ में भी अकेले होते हैं ....लेकिन कुछ लोग हमेशा ही अकेले !
    लगता है.............. वही मैं हूँ ....
    इन्सान का नेक होना आजकल कोई मायने नहीं रखता .............आज इंसान को दुनिया जाने तभी वह महान है .......जिसे कोई नहीं जानता ......भला वह कैसे महान हो सकता है .....हमारी भारत भूमि कितने महान सपूत जनी है कोई उनके नाम नहीं जानता .....वो तो आये और चुपके से निकल गए , बिना अपनी पहचान बताये ........
    कोई भीड़ में चलना पसंद करता है .....कोई अकेले .....
    कईयों को ये गुमान होता है कि मुझे कई लोग जानते हैं ...बड़ा सम्मान है मेरा .....वे लोग उसी में खुश रहते हैं ..........लेकिन किसी को सम्मान भी एक बोझ लगता है ...लगता है कि कैद कर लिए गए इस सम्मान के बीच ......नुमाइश कि तरह गले में लटका दिया है सम्मान को !
    कि बड़ा सम्मानित इंसान है ....................!
    वे तो उड़ना चाहते हैं बिना किसी बंदिश के ...........जहाँ केवल वे हो और उनकी जीवंत कल्पनाये ......उनकी कल्पनाएं ही उनकी अमानत होती है ....बाहर से दिया गया बोझ नहीं !
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    वे अकेले होते है बिल्कुल अकेले ....लेकिन जब कोई ह्रदय उनके सिर पर हाथ फेर कर कहता है कि मैं तो तुम्हारा ही हूँ ......तो उनकी पलकों से एक अश्रु धारा फूट पड़ती है ...............जिसका मतलब होता है कि शायद मैं तुम्हे ही ढूंढ रहा था ................. ***

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    कभी मैं भी खुद को देखा करता था ,उन वादियों में ,वर्षा के बाद ढलते सूरज की सिंदूरी छटा में, इन्द्रधनुष में ,साँझ की उस वेला में ,जिसमे काम की थकावट के साथ एक अजब सा सुकून होता है ,गोधूलि की उस वेला में जिसमे गायें लौट रही होतीं अपने खूटों पर ,उस रेतीले पहाड़ पर जहाँ मोहक धूल सा कुहासा होता ,उस राजमहल में जहाँ कभी राजा बैठ कर नर्तकियो के नृत्य देखा करता और खामोश रहते उसके पहरे दार ,उस झरने में जो मुद्दतों से बहता आ रहा है

    लेकिन मैं गलत था ,मैं तो कुछ भी नहीं ...........एक बोझ के अलावा ..................जो सब पर ? है .

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    कभी विचरा करते थे बेखौफ,इन गुलज़ार -ए-चमन में
    अब खुद को छिपाए फिरा करते हैं,गुनाहगारों की तरह .

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    लगी नींद जब थपथपाने मुझे
    तेरी याद आई रुलाने मुझे

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    हरिफों से कह दो कि तन्हा हूँ ,
    चले आयें अब आजमाने मुझे
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    सोचा कि एक मिटटी का घर बनाऊ....लेकिन ये आंसू गला देते हैं ,
    हंसी आती है जब मुझे ....बीते लम्हे रुला देते हैं
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